क़लम

24 मई 2017   |   कुँवर दीपक रावत   (115 बार पढ़ा जा चुका है)

वो क़लम नहीं हो सकती है

जो बिकती हो बाज़ारों में !

क़लम वही है जिसकी स्याही,

ना फीकी पड़े नादिया की धारों में !!


क़लम वो है जो बनती है,

संघर्ष के तूफान से !

लिखती है तो बस सिर्फ़

मानवता क़ी ज़ुबान से !!


क़लम चाकू नहीं खंज़र नहीं,

क़लम तलवार है !

सत्यमेव ज्यते ही

इसका आधार है !!


समाज़ के हर वर्ग तक

इसका विस्तार है !

ये ना किसी की मोहताज,

ना क़र्ज़दार है !!


बेखौफ़ आँधियों और

तूफ़ान सा वार करती है !

प्रव्रति से ज़ुल्म पर

सदा प्रहार करती है !


साहित्य का भंडार,

इसका चमत्कार है !

माँ सरस्वती का दिया,

अद्‍भुत उपहार है !!


देशभक्ति सच्चाई भरा

इसका हर व्‍यवहार है !

समाज का उत्थान

इसका अधिकार है !!


कभी कल्पना से कभी

सच से रिश्ता निभाती है !

झूठ को कभी ना

ये सच बनाती है !!


- कुँवर दीपक रावत

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बहुत बहुत बहुत ही बढ़िया

हृदय से आभार शर्मा जी

रेणु
24 मई 2017

अच्छी रचना दीपक जी

हृदय से आभार रेणु जी

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