वो लम्हे कहाँ फ़ुरसत के

24 मई 2017   |   कुँवर दीपक रावत   (147 बार पढ़ा जा चुका है)

 वो लम्हे कहाँ फ़ुरसत के - शब्द (shabd.in)

वो लम्हे कहाँ फ़ुरसत के, वो पल कहाँ राहत के !

अब इंतेज़ार है और ख़्वाहिश है, वो निशान कहाँ हसरत के !!

कभी सबको साथ लेकर चलने की आदत थी दोस्तो !
अब ख़बर नहीं कहाँ है, वो फसाने लड़कपन के !!

कभी चाहत पे दुनिया का हर जर्रा जर्रा कायम था !
मुद्दत हुई खोजते, वो गुलिस्ताँ कहाँ चाहत के !!

कभी दुश्मन भी हमारा, दोस्ती को तरसता था !
अब अपना भी नहीं कोई, वो अफ़साने कहाँ किस्मत के !!

नज़र फेर लेना बेशक दीपक से तुम गम नहीं !
अपनेपन का कायल है, उसकी कुदरत को समझ के !!

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हार्दिक आभार शर्मा जी

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