दर्पण

26 मई 2017   |  एस. कमलवंशी   (422 बार पढ़ा जा चुका है)

दर्पण

बोले टूटकर बिखरा दर्पण , कितना किया कितनों को अर्पण,

बेरंगों में रंग बिखेरा, गुनहगारों को किया समर्पण।


देखा जैसा, उसको वैसा, उसका रूप दिखाया,

रूप-कुरूप बने छैल-छवीले, सबको मैंने सिखाया,

घर आया, दीवार सजाया, पर विधना की माया,

पड़ूँ फर्श पर टुकड़े होकर, किस्मत में ये लिखाया।


चलती है सबकी मनमानी, जिद करने की सबने ठानी,

न चलता जब ज़ोर किसी पर, बाद मेरी है बारी आनी।

किसी की ठोकर, किसी के पत्थर, किसी के हाथ चलें तूफानी,

टुकड़ा टुकड़ा कहे निरंतर, मेरा हाल बस मेरी जुबानी।


शीशमहल के सूने मंज़र, दिल में चुभते उनके खंजर,

सूनापन हर ओर समाता, मेरी आँखें बंजर बंजर,

शीशमहल के शीशे कहते, और भी टुकड़े होंगे अंदर,

गृहकलेश और वाद-विवादन, हमको बना दिया है खण्डहर।


सजनी के मैं संग का साथी, मुझको देखे निहारे,

मुझमें हँसती, मुझमें बसती, सौंह करे बड़े न्यारे।

बाल सँवारे, नैन हैं कारे, देख के अँखियाँ मारे,

मुझको रखती सामने अपने, दिखते प्रियतम प्यारे।

देर तलक न चले ये किस्से, गढ़ गया वहाँ खफा का खूंटा,

प्यार प्रेम का दरख जहाँ पर, जम गया वहाँ ज़फा का बूटा,

तस्वीरों के शीशे बिखरे, जैसे था सब हमने लूटा,

सजना रूठा, सपना टूटा पर टुकड़ों में था मैं फूटा।


कितने ही किस्से मैं सुनाऊँ, सबमें अपना हाल ये पाऊँ,

चाहत मेरी इतनी सी बस, बेदर्दी न तोड़ा जाऊँ।

मेरे अंदर एक समंदर, लाखों तो मैं राज़ छुपाऊँ,

जो मुझसे जैसा है पूंछे, उसको ही वैसा मैं बताऊँ।


कितनों के तू दर है भटका, कितने रूप सँवारे?

दानी हों या रंक-फकीरे, सबके ही, मेरे प्यारे!

कैसे तू बनके है आया, कौन है तुझे तराशा?

आग तपिश और रजत कशिश, इतनी ही मेरी आशा!

कैसी है तेरी बोली भाषा, कैसे हैं तेरे नैना?

तेरी बोली मेरी भाषा, दीद तेरे मेरे नैना।

कौन कौन से रूप हैं तेरे, कैसी तेरी काया?

जिस मानव की मुझमें छाया, उसका रूप समाया!

कैसे तू हँसता है दर्पण, कैसा तू भी रोता है?

रोना तेरा, हँसना तेरा, जैसा तू भी होता है!

कौन से रंग हैं तूने देखे, कौन सा है मन भाया?

सुर्ख लाल और श्वेत, सांवरे, जो भी जैसा लाया!

इतने रंग हैं इस दुनिया में, क्यों तू है बेरंगा?

जो भी मुझमें जैसा देखा, उसके रंग मैं रंगा!

है टूटना तुझको आखिर, क्यों फिर बनता बार बार तू?

गर जवाब दूँ हँसके इसका! हो जाएगा कर्जदार तू।

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वाह वाह वाह! क्या खूब कहा ... गर जवाब दूँ हसके इसका हो जायेगा कर्ज़दार तू. उम्दा

आपकी शैली हमेशा ही प्रभावित करती है।

धन्यवाद शर्मा जी। :)

स्नेहा
28 मई 2017

बहुत सुन्दर शब्दों की माला बुनी है. बधाई हो!! दर्पण का मन खोल के रख दिया. काश कोई ऐसा भी दर्पण बनता की इंसान खुद के भीतर के सच्चे रूप को भी देख पाता. यदि थोड़ा छोटा कर देते तो भाव और निखर के सामने आएगा. आजकल इतना ज्यादा पढ़ने का संयम कहाँ रहा है :)
बहुत सुन्दर लेख.

स्नेहा जी, कविता पर आपने जो विचार व्यक्त किए हैं मैं उनके लिए आपका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ एवं आपकी दी हुई सलाह का आगे से अवश्य ख़्याल रखूँगा। एक बार फिर से आपका बहुत बहुत धन्यवाद। :)

बहुत-बहुत सुंदर

धन्यवाद शालिनी जी।

रेणु
27 मई 2017

क्या बात है प्रिय कमलवंशी ! ! ! --- लाजवाब रचना -- अप्रितम भाव और सुघड़ भाषा और शैली ! ! ! ----------- वाह -- वाह और सिर्फ वाह ---------- निशब्द हूँ -- बस - एक बार फि र ------------ शा ----- बा ------- श ------

धन्यवाद रेणु जी। बस आपकी दुआओं और शुभकामनाओं का असर है।

है टूटना तुझको आखिर, क्यों फिर बनता बार बार तू?
गर जवाब दूँ हँसके इसका! हो जाएगा कर्जदार तू।
बेहतरीन जज़्बात! उम्दा लेखन। बोलती ही बंद करा दी दर्पण ने।

धन्यवाद प्रवेश जी।

बहुत खूब कमल जी।

धन्यवाद ऋषभ जी।

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