मंज़िल

28 मई 2017   |  Karan Singh Sagar ( डा. करन सिंह सागर)   (84 बार पढ़ा जा चुका है)

मंज़िल पर पहुँच कर,

देखा जो मुड़कर

साथी कोई दिखा नहीं

किस मोड़ पर छूटा साथ

इल्म इस बात का था नहीं

खड़ा हूँ अकेला शिखर पर

आसमान छूने की तमन्ना हो गयी पूरी

ज़मीन से नाता, मगर टूट गया है

इस जीत का जश्न मनाऊँ

या शोक पता नहीं


२७ मई २०१७

जिनेवा

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रेणु
31 मई 2017

बहुत प्यारी रचना है करण जी ------

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