"शून्य" 'आत्म विचारों का दैनिक संग्रह' "दिवास्वप्न"

30 मई 2017   |  ध्रुव सिंह -एकलव्य-   (278 बार पढ़ा जा चुका है)

 "शून्य" 'आत्म विचारों का दैनिक संग्रह' "दिवास्वप्न"

"दिवास्वप्न"


मैं सदैव विचार करता, कि ये दिवास्वप्न है क्या बला ? किन्तु जीवन के आज तक के अनुभव मुझे ये बताने लगे हैं कि हमारा कर्महीन होकर,अत्यधिक पाने की कल्पना का दूसरा नाम 'दिवास्वप्न' है।


''एकलव्य"

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सत्य वचन

रेणु
31 मई 2017

जी एकलव्य -- बिलकुल सही कहा आपने -------- दिवास्वप्न अकर्मण्यता का दूसरा नाम है ------- जीवन की सार्थकता कर्मशीलता में है कर्महीनता में नहीं - -- क्योकि आँखों के सपने हाथों के कर्म से अस्तित्व में आते है -- मात्र आँखों में सजाकर रखने से नहीं -- सार्थक विचार है आपका --- बहुत शुभकामना --

आभार रेणु जी

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