मैं मटमैला माटी सा

04 जून 2017   |  एस. कमलवंशी   (478 बार पढ़ा जा चुका है)

मैं मटमैला माटी सा

मैं मटमैला माटी सा , माटी की मेरी काया,

माटी से माटी बना, माटी में ही समाया।

समय आया, आकाश समेटे घाटी-माटी पिघलाया,

अगन, पवन, पानी में घोलकर, तन यह मेरा बनाया।।


जनम हुआ माटी से मेरा, माटी पर ही लिटाया,

माटी चखी, माटी ही सखी, माटी में ही नहाया।

माटी-घर, माटी ही घाट, माटी के खेत का खाया,

माटी-चाक आजीविका, माटी का धन मैं लाया।।


माटी ही मात्, माटी ही तात, माटी की ऐसी माया।

माटी ही भ्रात, माटी बहन, माटी सा मेरा साया,

माटी से बंधन जोड़कर, माटी की दुल्हन लाया,

माटी तनय, माटी सुता, माटी परिवार बसाया।


माटी का मन, माटी भवन, माटी की अलख जगाया,

माटी गिरीश, माटी को पीस, माटी का तिलक लगाया।

माटी का लेप, माटी को थोप, माटी की भस्म रमाया,

माटी में मूरत गूढ़कर, माटी को ईश बनाया।


हे माटी! मेरी मति फिरी, जो माटी से उलझाया,

माटी मरी न, मैं मरा, माटी ने खेल रचाया,

माटी का घड़ा, माटी में पड़ा, माटी में गया दबाया,

मैं फिर मटमैला माटी सा, माटी में ही जा समाया।

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रेणु
30 अगस्त 2017

पञ्च लिंकों को गूगल के जरिये जरूर देखें प्रिय कमलवंशी---------- सस्नेह ----

रेणु
28 अगस्त 2017

प्रिय कमल ------ आज साहित्य समाज से आपका परिचय होते देख मन बाग - बाग है बहुत बधाई और शुभकामना आपको फिर से कन्हुगी --------------- शाबाश ----

Sudha Devrani
28 अगस्त 2017

बहुत ही सुन्दर माटी की सौधी खुशबू जैसी

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द" में सोमवार 28 अगस्त 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com आप सादर आमंत्रित हैं ,धन्यवाद! "एकलव्य"

kalpana bhatt
03 जुलाई 2017

बहुत अच्छी रचना ।

एस. कमलवंशी
08 जुलाई 2017

धन्यवाद कल्पना जी

हे माटी! मेरी मति फिरी, जो माटी से उलझाया,
माटी मरी न, मैं मरा, माटी ने खेल रचाया,
माटी का घड़ा, माटी में पड़ा, माटी में गया दबाया,
मैं फिर मटमैला माटी सा, माटी में ही जा समाया।
आदरणीय ,कमलवंशी साहब आपकी रचना हृदय के उन अनछुए पहलुओं को उजागर करती है जिसको मानव सदैव विस्मृत करता हैं सुन्दर ,सजीव जीवन का सत्य उजागर करती आपकी रचना आभार ," एकलव्य"

एस. कमलवंशी
08 जुलाई 2017

धन्यवाद ध्रुव जी। :)

बहुत ही अदभुत एवं सटीक शब्द चयनों से सु-सज्जित सम्पूर्ण अभिव्यक्ति,...बहुत ही बढ़िया सर

धन्यवाद मनोज जी।

एक बार फिर से आपकी रचनात्मकता, शब्द चयन एवं शैली पर अवाक् हूँ| बहुत ही सार्थक रचना|

धन्यवाद ऋषभ जी।

रेणु
05 जून 2017

तन माटी ये मन भूल चला
धन - जोबन में फंस - फूल चला
जग रैन बसेरा बिता चला जब -
माटी में होकर धूल मिला-----------
प्रिय कमल --------- आपकी एक और ह्रदय को छू लेने वाली और सच के सामने ला खड़ा करने वाली रचना पढ़ी -------- मन भावुक हो उठा -- आपो इस सुन्दर रचना के लिए सस्नेह शुभकामना -------- और बधाई --

धन्यवाद रेणु जी। अत्यंत सुंदर पंक्तियाँ लिखी हैं आपने। :)

बहुत बहुत अच्छी रचना

धन्यवाद शर्मा जी

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