मोरे पिया बड़े हरजाई रे!

08 जुलाई 2017   |  एस. कमलवंशी   (434 बार पढ़ा जा चुका है)

मोरे पिया बड़े हरजाई रे!

ओ री सखी तोहे कैसे बताऊँ, मोरे पिया बड़े हरजाई रे,

रात लगी मोहे सर्दी, बेदर्दी सो गए ओढ़ रजाई रे।


झटकी रजाई, चुटकी बजाई, सुध-बुध तक न आई रे!

पकड़ी कलाई, हृदय लगाई, पर खड़ी-खड़ी तरसाई रे!

अंगुली दबाई, अंगुली घुमाई, हलचल फिरहुँ न आई रे!

टस से मस न हुए बलम, इन्हें नींद साँझ से भायी रे!

आग लगे उस बैरन निंदिया, जो पिया लये छिनाई रे!

ओ री सखी तोहे कैसे बताऊँ, मोरे पिया बड़े हरजाई रे!


फूल भरे उस अंगना में, जब फूल सी देह सजाई रे!

फूल भरी सेजा पर फूली, फूल फूल मुरझाई रे!

फूल भूल मन भूली, काँटा, भूल-फूल भर लाई रे!

फूल की गूल में सूल चुभी, तब याद भूल की आई रे!

अब मैं बेचारी क्या करती, सब फूल धूल बिखराई रे!

ओ री सखी तोहे कैसे बताऊँ, मोरे पिया बड़े हरजाई रे


देख चंदनियाँ रोए सजनियाँ, फूटी किस्मत पायी रे!

हाथ मली, और विरह जली, मन की गांठ दबाई रे!

हृदय जले पीर के मारे, पीर सी भयी पराई रे,

पीर बिना मोहे पीर दे गए, पीर-पीर तड़पाई रे।

रात-कली शीत से झुलसी, तन से न खिल पायी रे,

ओ री सखी तोहे कैसे बताऊँ, मोरे पिया बड़े हरजाई रे!

अगला लेख: अपनी सोहरत से डरता हूँ



विरह रोमांस और नारी मन के सरल भावो का सुन्दर चित्रण ।

रेणु
09 जुलाई 2017

क्या बात ! क्या बात ! और क्या बात !!!!!!!!!!!!!!!! प्रिय कमलवंशी ------- एक बार फिर शाबाश !!!!!! बहुतही मजी हुई सुन्दर रचना -- माँ सरस्वती तुम्हारी लेखनी का प्रवाह बनाये रखे -- सस्नेह -------

एस. कमलवंशी
14 जुलाई 2017

धन्यवाद रेणु जी।

बहुत ही उम्दा!

एस. कमलवंशी
14 जुलाई 2017

धन्यवाद निर्मल जी

"पीर बिना मोहे पीर दे गए" से आपका क्या आशय है!
लगता है आप शरारती हो रहे हैं। ;)

एस. कमलवंशी
14 जुलाई 2017

यह तो पाठक के विचारों पर निर्भर करता है कि इन पंक्तियों का वह क्या मतलब निकालता है। पीर बिना मोहे पीर दे गए से मेरा मतलब यह है कि मैं पीर नहीं हूँ लेकिन मैं फिर भी पीर (सन्यासी/साधु) का जीवन जी रही हूँ अर्थात प्रेम से वंचित हूँ।

कविता का विषय ही कुछ ऐसा है। ज़ाहिर है कुछ तो शरारत बनती है।

मिलन ठाकुर
09 जुलाई 2017

यह कविता वाकई बहुत सुंदर है। बेमिसाल तुकबंदी और उतने ही बेमिसाल भावार्थ। किंतु मुझे निम्न पंक्ति का उचित भाव समझने में थोड़ी समस्या आ रही है।
फूल भूल मन भूली, काँटा, भूल फूल भर लाई रे!
फूल की गूल में सूल चुभी, तब याद भूल की आई रे!
कृपया उपरोक्त पर अपने विचार व्यक्त करें।
धन्यवाद

एस. कमलवंशी
14 जुलाई 2017

नायिका जिन पुष्पों को लेने जाती है वह उन्हें लाना भूल जाती है एवं भूल रूपी पुष्पों अर्थात कांटों को ले आती है। इन पंक्तियों में पुष्प की तुलना उस प्रेम से की गई है जिसे नायिका पाना चाहती है और काँटे वह तकलीफ है जो नायिका को वास्तव में मिलता है।

बेहतरीन रचना। आपकी रचनाओं में आपको शब्दों के साथ आपको खेलते देखकर दिल खुश हो जाता है।
सस्नेह
प्रवेश

एस. कमलवंशी
14 जुलाई 2017

आपकी विशिष्ट टिप्पणी के लिए धन्यवाद प्रवेश जी।

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x