खुले दरवाजे पर दस्तक

15 जुलाई 2017   |  इंजी. बैरवा   (219 बार पढ़ा जा चुका है)

खुले दरवाजे पर दस्तक


इस अद्भुत संसार की प्राणी सृष्टि भी बडी विचित्र है ! धरती के उपर भी जीव है और धरती के नीचे भी जीव है; पानी के अन्दर भी जीव है और पानी के बहार भी जीव है । बहुत सारे जीव या यूँ कहिए कि, अनगिनत जीव, जिन्हें डिस्कवरी टीवी चेनल हमें दर्शन करवाती है, उन जीवों के नाम तक भी हमने नहीं सुने होंगे । इसे दिखाने वाला भी मनुष्य है और देखने वाला भी मनुष्य है । टेलीविजन (टीवी) बनाने वाला भी मनुष्य है और टीवी देखेने वाला भी मनुष्य है । पशु-पक्षी और समस्त जीव-जंतु टीवी नहीं देखते है तथा उन्हें सेल-टेक्स या इनकम-टेक्स भरने की भी कोई चिंता नहीं है । ये सभी प्रकार के टेक्स मनुष्य द्वारा ही लागू किए गए है और मनुष्य को ही भुगतना है ।

मनुष्य इस सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है और पृथ्वी पर विद्यमान मनुष्यों के कारण ही हम सभी को संसार सुन्दर और रसप्रद लगता है । कई बार इन मनुष्यों के कारण डरावना भी लगता है !! इसी कारण से इस संसार को अद्भुत / आश्चर्यजनक कहा गया है । संसार को हमेशा से ही अच्छे लोगो की आवश्यकता रही है, इसके बावजूद भी वह बुरे मनुष्यों का पोषण भी करता रहा है । यहाँ दोस्ती है तो दुश्मनी भी है । मनुष्य जितना हक़दार है, उतना जवाबदार भी है । किन्तु इसमें मुसीबत यह है कि, वह ना तो पूर्ण हक़दार बन पाया और ना ही जवाबदार ! कहीं पर भी सम्पूर्णता नहीं है । जहाँ थोडी बहुत सम्पूर्णता का आभास होता है वहाँ पर दूसरा पहलू असम्पूर्णता का आश्चर्य दिखता है । यही आश्चर्य असमानता का अहसास करवाता है । हमारे लोकतांत्रिक देश में बड़ी से बड़ी एकमात्र समस्या असमानता ही है, जिसे काफी प्रयासों के बावजूद दूर नहीं किया जा सका है । यह असमानता एक रूप में भी नहीं है, कहीं पर सम्पत्ति की असमानता, कहीं पर शैक्षणिक असमानता... ! सभी अशिक्षित बेकार या बेरोजगार नहीं है और सभी शिक्षितों को नौकरी भी नहीं मिलती है यदि नौकरी मिल भी गई तो, सह कर्मचारियों के नाम के साथ “अटक अर्थात जाति” और “पद” एक बड़ी समस्या बन जाती है । किसी को अपनी ‘अटक’ का गुरूर तो किसी को अपने ‘पद’ का गुरूर तथा साथ-साथ में बहुत सारे अपनी ‘अटक’ एवं ‘पद’ के कारण ही हीनभावना से ग्रसित है !!

शहरी एवं ग्रामीण जीवन की असमानता दूर करने के सचोट प्रयास कभी किए ही नहीं जाते है । गांवों में सरकारी बसें मिली (वो भी अनियमित और अपर्याप्त), टेलीफोन की सुविधा मिली (उसमें भी नेटवर्क की घपलेबाजी) ! वैसे आजकल ग्रामीण प्रजा भी बेलगाडी,घोडा-गाड़ी एवं अन्य पारम्परिक साधनों के स्थान पर टू-व्हीलर या फोर-व्हीलर जैसे साधनों के प्रयोग में शहरीकरण की तरह काफी वृद्धि हुई है । इसके बावजूद हमारा आधुनिक टेलीविजन दिखाता ही रहता है कि, कौन कितना सुखी और सम्पन्न है ! जिसे देखने के बाद गाँव के लोगो को अहसास होता है कि, शहर वाले गाँव वालों की तुलना में ज्यादा सुखी और सम्पन्न है । शहरों में सभी प्रकार की सुख-सुविधाएँ है, रोगों के ईलाज के लिए गली-गली आधुनिक दवाखाने है जबकि गाँव में सामान्य चोट लगने पर मरहम-पट्टी हेतु आठ-दस किलोमीटर जाना पड़ता है, उसके लिए कोई वाहन मिले तो ठीक, अन्यथा कराहते-कराहते हुए पैदल... तब ऐसी घटना होने पर, उसकी शहर में रहने वाले मनुष्य के प्रति ‘खुन्नस’ पैदा होना स्वाभाविक है !

बारिस पर आधारित किसान की स्थिति अच्छी नहीं है । पूरे वर्ष खेत को फसल के तैयार करना, निंदाई-गुड़ाई करके, बुआई की गई फसल को लहलहाता देखकर मन ही मन बहुत खुश होता है । उसे लगता है कि, अब कलश से दूध चढ़ाने का समय नजदीक है, किन्तु फसल तैयार होने से पूर्व जब बारिस समय पर ना हो या देरी से हो अथवा ख़राब हो जाए, तब तन-मन-धन से थके हुए किसान की सारी मेहनत बेकार जाती है और हाथ में एक भी दाना नहीं आता है !!! ...लगातार मिलती हताशा, बढती हुई पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और कर्ज के बोझ के कारण अनेक बार असुरक्षा की भवना उत्पन्न होने से आत्महत्या की ओर प्रेरित होते है और वर्तमान में यह मामला काफी गम्भीर भी है

हाँ तो, मै असमानता बाबत चर्चा कर रहा था... अमीरी और गरीबी के बीच तो असमानता समझ आती है किन्तु गरीबी में भी असमानता देखने को मिलती है । सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में गरीबी रेखा के नीचे जीने वाले लोगो की संख्या 27% है जबकि वर्ष 1971 में इसकी संख्या लगभग 50 से 52% के बीच में थी और निश्चितरूप से इसे 27% औसत तक लाना काफी संतोषजनक कार्य है । किन्तु इसमें भी समानता कहाँ पर है ? उड़ीसा में गरीबी रेखा के नीचे आने वाले लोगों की औसत संख्या 47% है जबकि पंजाब में 8% ! अब आप थोडा सा पंजाब और उड़ीसा के लोगों के जीवनयापन और रहन-सहन का मूल्याकन करिए और विचार कीजिए कि, वास्तव में क्या ये दोनों राज्य भारत देश के ही राज्य है ? उड़ीसा की लगभग आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, इसके बाद बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश का नाम आता है । प्रत्येक राज्य की स्थिति अलग-अलग है । यदि थोडा सा 27% का हिसाब लगाए तो भारत के 125 करोड़ की आबादी में से लगभग 28 करोड़ (अमेरिका की आबादी से भी अधिक) लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे है !!!

बहुत सारी समस्याओं की भरमार है और समस्याएँ चिल्ला-चिल्लाकर सामने आ रही है या प्रदर्शित हो रही है । किन्तु इनकी आवाज जहाँ पहुँचना चाहिए, वहाँ नहीं पहुँच पा रही है अथवा दूसरे शब्दों में कहें कि, पहुंचाई नहीं जा रही है और सब कुछ वाहवाही के शोर में दब गया है । यह वाहवाही व्यक्तिपूजा की उपज है । जहाँ समस्या दूर करने का प्रयास होना चाहिए वहाँ ज्वलन्त और चिखती-चिल्लाती हुई समस्या का गला/मुँह दबाकर रखने का प्रयास किए जा रहे है । इसे लाचारी की उपमा दे या बुरी आदत... खुद को सलामत रना चाहिए । आपको ज्ञात होगा कि, इससे पहले भी ‘इण्डिया अर्थात इन्दिरा’ और ‘इन्दिरा अर्थात इण्डिया’ का उद्भव व्यक्तिपूजा से ही हुआ था तथा आज भी यही हो रहा है, मै तो कहूँगा कि, पहले से भी ज्यादा जोश के साथ पूजा हो रही है । यह व्यक्तिपूजा मनुष्य के पास से ‘विकल्प’ छीन लेने का कार्य करती है, साथ ही कुछ हद तक दूसरों पर आश्रित रहने को बढ़ावा देती है । कहावत है, सिर सलामत तो पगड़ियों की क्या कमी ! यह जानते हुए भी हम सभी पगड़ी का आदर करते है और करते आ रहे है । भले ही सिर कट जाए किन्तु पगड़ी की शान ना जाए, ऐसा आदर पाने वाली पगड़ियों को भी सिर के माप का ध्यान रखा जाना चाहिए । सिर पर शोभायमान पगड़ी से ज्यादा माप की पगड़ी की लालसा जब मनुष्य के मन में जन्म लेती या जगती है, उसी दिन से पगड़ी की आंटियाँ खोलने की शुरूआत भी हो जाती है । व्यक्तिपूजा से खुश होने पर, व्यक्ति स्वयं को संस्था से भी बड़ा होने का दिखावा करने का प्रयत्न शुरू कर देता है, उसी दिन से संस्था और उस व्यक्ति के बीच का अंतर बढ़ना शुरू हो जाता है तथा अनेक बार व्यक्ति और संस्था दोनों अलग-अलग हो जाते है इसमें संस्था तो वही पर रहती है किन्तु व्यक्ति कहाँ पर फेंक दिया गया है, कई बार उसे खोजना पड़ता है ; कई बार तो इसकी आवश्यकता भी नहीं होती है ! संस्था से भी ज्यादा बनने की चाह की प्रेरणा, व्यक्तिपूजा की अत्याधिकता से मिलती है और यह अतिरेक हमेशा पूज्यपात्र के लिए हानिकारक शाबित होता है । इस प्रकार के मामलों में युवाशक्ति/युवालहर जूनून की कोई निश्चित एवं अडिग रणनीति नहीं होती है । वे प्रसिद्धि के शिखर पर चढाते है और अनजान गर्तों में धकेल भी देते है । श्री कॄष्ण जैसे दूरदर्शक को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा था । कंस वध (हत्या) के बाद मथुरा नगरी के जन समुदाय द्वारा, कृष्ण जी को सिर पर बिठाकर नाँचे थे और मथुरा का गादीपति बनाया गया और उन्ही लोगों के द्वारा उनके विरुद्ध विद्रोह भी किया गया । इन्ही लोगो के द्वारा अर्जुन के सारथी बनने के बाद ‘रणछोड़’ का भी नाम दिया गया । इन्ही लोगों के द्वारा ईसा मसीह को ‘शूली’ पर चढ़ाया गया । इन्ही लोगों के द्वारा महात्मा गाँधी पर गोलियाँ दागी गई । इसी युवाशक्ति जूनून द्वारा अंग्रेजों को भगाया गया । यही युवालहर ने इंदिरा गाँधी को घर का रास्ता दिखाया गया और इसी युवालहर ने ख़ुशी-ख़ुशी वापस गद्दी पर भी विराजमान किया गया । कहने का तात्पर्य यह है कि, युवालहर और युवाशक्ति जूनून के बारे में कुछ भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है । वह जिसे पूज्यपात्र बनाता है, उसे मौका मिलने पर नीचे गिराने का जूनून भी चढता है । इस तरीके से वर्तमान में पूज्यपात्र को सावधान रहने के आदेश, सांकेतिक रूप से मिल भी रहे है ।

(courtecy : http://www.gujaratsamachar.com/index.php/articles/display_article/ravi-purti/ravipurti-magazine-gujarati-writer-khula-barne-takora-khalil-dhantejvi-09072017)

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