स्पॉटलाइट : योगी ही नहीं मोदी के लिए भी क्यों ज़रूरी हैं सुरेश खन्ना जैसे मंत्री

16 जुलाई 2017   |  इंडियासंवाद   (36 बार पढ़ा जा चुका है)

स्पॉटलाइट : योगी ही नहीं मोदी के लिए भी क्यों ज़रूरी हैं सुरेश खन्ना जैसे मंत्री

नई दिल्लीः

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बाद कोई मंत्री अगर पार्टी और संघ की नज़र में चढ़ा है तो वे योगी की तरह ही अविवाहित बीजेपी नेता सुरेश कुमार खन्ना हैं. लेकिन खन्ना पर 'स्पॉटलाइट' का कारण उनका अविवाहित होना नहीं है. दरअसल ,पार्टी हाई कमान के हाल ही के ' उस' सर्वे में खन्ना को काम करने वाले मंत्री के तौर पर देखा गया है जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार या किसी विवाद की एक भी शिकायत नहीं है. 'इंटीग्रिटी एंड परफॉरमेंस' यानी सत्यनिष्ठा और बेहतर कार्यशैली के मामले में खन्ना, उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में बेदाग़ छवि वाले परफ़ॉर्मर मंत्री माने जा रहे हैं. जाहिर है मिशन 2019 के लिए यूपी में सुरेश खन्ना जैसों की अब मोदी और शाह को ज़रुरत है.

रात के तीन बजे भी कार्यक्रम में पहुंच जाते हैं सुरेश खन्ना

1989 से अब तक लगातार बीजेपी के टिकट पर शाहजहांपुर से विधान सभा पहुंचने वाले सुरेश खन्ना देश के उन चंद नेताओं में है जिन्हे उनके गढ़ में कोई हरा नहीं सकता है. यूपी में किसी भी वर्तमान विधायक की लगातार जीत दर्ज़ करने का ये रिकॉर्ड है. 28 साल तक लगातार यूपी जैसे प्रदेश में विधान सभा का चुनाव जीतना किसी के बस की बात नहीं है. वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ल कहते हैं, " खन्ना अपने क्षेत्र में 'राउंड द क्लॉक' और हफ्ते के सातों दिन काम करने वाले नेता हैं.

छोटे से छोटे कार्यकर्ता को वो उतनी ही अहमियत देते हैं जितनी की किसी सरकारी अफसर को." खन्ना को दलितों से लेकर हर समाज के बीच रहते-मिलते-घुलते देखा जा सकता है. " कोई माने या न माने पर मुस्लिम बाहुल्य इलाकों से भी उन्हें खूब वोट मिलता है. खन्ना की विचारधारा से कोई मुसलमान सहमत न हो पर खन्ना के काम का वो कायल है," इंडिया संवाद से बातचीत में बीजेपी पर पैनी निगाह रखने वाले पत्रकार बृजेश शुक्ल ने बताया. बृजेश कहते हैं कि खन्ना अपने काम का दिखावा नहीं करते और अपने प्रचार के लिए पत्रकारों को नहीं साधते हैं.

खन्ना के बारे में बताया जाता है कि अगर उन्हें कोई भी न्योता मिले तो वे मोहल्ले से लेकर ज़िले भर के हर कार्यक्रम में ज़रूर पहुँचते हैं. मंत्री बनने के बाद, हाल ही में शाहजहांपुर के एक पब्लिक मुशायरे में वे रात तीन बजे पहुंचे. मंच पर सारे शायर इस बात से हैरान थे कि योगी का मंत्री रात तीन बजे भी अपने क्षेत्र में हाज़िरी दे रहा है.

सचिवालय से रोज़ घर लौटने वाले सबसे आखिरी व्यक्ति


संसदीय कार्यमंत्री होने के नाते सुरेश खन्ना जहां सदन की एक एक कार्रवाई पर ध्यान देते हैं वहीं नगर विकास मंत्री होने के नाते उन्हें स्वच्छ भारत अभियान की बड़ी जिम्मेदारी भी मिली है. स्वच्छता के इस अभियान में यूपी 2016 -17 के सर्वे में भारत में सबसे पीछे था. गंदगी और कचरे के मामले में गोंडा सहित 50 सबसे गंदे शहरों में यूपी आगे रहा है. योगी और खन्ना अब दोनों पीएम मोदी के स्वच्छता अभियान में जुट गए हैं. खन्ना सारी योजनाओं को ज़मीन पर उतारने के लिए हर बड़े ज़िले के नगर आयुक्त से सीधे संपर्क में रहते हैं.

उनका फोकस प्रधामंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से लेकर योगी के शहर गोरखपुर तक केंद्रित है. लेकिन इन सबके बीच खन्ना की बड़ी चुनौती सदन को सकारात्मक बनाना है. शायद इसलिए वे देर रात तक सचिवालय में, सदन में उठने वाले हर अहम सवाल का जवाब तैयार करवाते रहते हैं. "रात के 11 बजे रहे हों या 12 ..सचिवालय से सबसे आखिर में खन्ना ही घर लौटते हैं," सचिवालय में तैनात खन्ना के एक स्टाफ ने बताया.

भाई-भतीजों को सरकारी बंगले से दूर रखते हैं खन्ना

जहां योगी के विधायक और मंत्री सरकारी सुरक्षा पाने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री के आगे कतार लगाए खड़े रहते हैं वहीं खन्ना को गनर और कमांडो के साथ चलना पसंद नहीं है. खन्ना के पुराने सहयोगी और शाहजहांपुर बीजेपी के नेता सुचित सेठ कहते हैं कि वो मंत्री बनने से पहले सिर्फ ड्राइवर के साथ अकेले, गाडी में चलना पसंद करते थे

मंत्री बनने के बाद जब योगी ने उन्हें अरबो रूपए के घोटाले वाले गोमती रिवर फ्रंट की जांच समिति का अध्यक्ष बनाया तो सुरक्षा के लिहाज़ से उन्हें जेड श्रेणी की सिक्योरिटी दी गयी. " लेकिन खन्ना साहब ने सिक्योरिटी लेने से इंकार कर दिया. उनका कहना था मुझे लोगों के बीच रहना है. मै बन्दूक के घेरे में रहूंगा तो गाँव-देहात के आधे लोग तो कमांडो देखकर ही सहम जायेंगे," सेठ ने फोन पर बताया. जहाँ तक घर को राजनीति से अलग रखने की बात है, सादगी के उस गुण में भी खन्ना काफी खरे उतरते हैं.

यूं तो इस बैचलर मंत्री का अपना परिवार नहीं है पर वे अपने भाई और दो भतीजों के घर में शाहजहांपुर में रहते आये हैं. " जहां मंत्रियों के बंगलों पर आपको परिवार के लोग सरकारी फैसले लेते मिलेंगे वहीं हमारे खन्ना साहब के भाई और भतीजे कभी मंत्री जी के दफ्तर में नहीं दिख सकते हैं. दफ्तर क्या उनके दोनों भतीजे लखनऊ भी नहीं आते हैं. ये वो बातें हैं जो खन्ना जी के कद को बढ़ा कर देती हैं. ऐसा नेता, मुलायम और मायावती के यूपी में आपको आज कहाँ मिलेगा," सेठ ने खन्ना की सादगी पर बेबाक बात कह डाली.

बेशक खन्ना की दिनचर्या बीजेपी के अडवाणी या संघ के सरसंघचालक की सादगी से प्रभावित हो लेकिन बतौर कैबिनेट मंत्री खन्ना की चुनौती यूपी में कम कम नहीं हैं. उनकी पहली चुनौती उस सदन को फिर से गरिमा मय बनाने की है जहाँ कुछ वर्षों से आज़म खान जैसे संसदीय कार्य मंत्रियों ने निज हित के लिए सदन को अपनी अदालत बना दिया था.

खन्ना के आगे दूसरी बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार का अड्डा बनी नगर निगमों और पालिकाओं को पटरी पर लाना है. और खन्ना की तीसरी चुनौती, करोड़ों- करोड़ के बजट के बीच अपनी सादगी और ईमानदारी को बरक़रार रखना है. उस ईमानदारी को जिसके लिए आज वो इंडिया संवाद के स्पॉटलाइट बने हैं.

स्पॉटलाइट : योगी ही नहीं मोदी के लिए भी क्यों ज़रूरी हैं सुरेश खन्ना जैसे मंत्री

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