साध्वी

20 जुलाई 2017   |  धर्मेंद्र राजमंगल   (280 बार पढ़ा जा चुका है)

साध्वी  - शब्द (shabd.in)


शहर के दूसरे छोर पर खाली पड़े मैदान की एक अलग पहचान थी. उसमें उगे पेड़ों की छाँव और वहां का शांत वातावरण हर किसी को लुभाता था. यहाँ से गुजरते हुए लोगों को उन पेड़ों की छाँव में नर्म घास पर लेटे, बैठे और खड़े प्रेमी जोड़ों के दर्शन बड़े आराम से हो जाते थे.

ये वो लोग थे जो घर वालों से छुप कर एक दूसरे से मोहब्बत किया करते थे. लेकिन इन लोगों से पहले यहाँ खेती करने वाले किसान दोपहर में सुस्ताते थे. जब खेती बंजर हुई तो चरवाहे अपने पशुओं को लेकर आने लगे. लेकिन जैसे जैसे शहरीकरण हुआ तो सब कुछ बदल गया और आज यहाँ लडके लडकियों के झुण्ड अपने प्यार की पींगे बढ़ाते नजर आते थे.

कोई दो बच्चों का बाप था तो कोई क्वारी लडकी. किसी महिला के बच्चे शादी लायक थे तो कोई अभी इंटर कॉलेज में पढ़ता था. किसी किसी की ताज़ा शादी हुई थी जो उनकी मर्जी के खिलाफ थी लेकिन उन्होंने आज भी अपने पुराने प्रेमी से मिलना बंद न किया था.

कुछ कॉलेज के लडके लडकियाँ कॉलेज जाने के नाम से घर से निकलते और सीधे इस सुरम्य स्थान पर आ रुकते. मानो यहाँ आज कोई विशेष लेक्चर होने वाला हो. सब एक दूसरे को मिलते देखते लेकिन कोई किसी से कुछ न कहता था.

जैसे चोर चोर मौसेरे भाई. चालीस साल की महिला सामने खड़ी बीस साल की लडकी को देख अपने प्रेमी के सामने वैसे ही नखरे करने की कोशिश करती थी और चार बच्चों का बाप अपने को कुंवारा दिखाने की कोशिश करता था.

लेकिन जैसे जैसे इसकी प्रसिद्धि बढ़ी वैसे ही इसकी खूबसूरती को किसी की नजर लग गयी. शहर में संस्कृति और समाज के रक्षकों को ये सब अच्छा न लगा. शहर की कट्टर धार्मिक मंडली ने इस सब को बंद करने का फैसला कर लिया.

इस धार्मिक मंडली की प्रमुख साध्वी अन्तरा ने अपनी मंडली के साथ उस शांत सुरम्य जगह पर धावा बोल दिया. साध्वी तो खुद एक तीस साल की जवान महिला थीं लेकिन फिर भी उन्हें इन प्रेमी जोड़ों की मोहब्बत का एहसास न हुआ. वहां खड़े इन जोड़ो को मार मार कर खदेड़ दिया गया.

प्रेमी जोड़ों को इस हमले की उम्मीद तो नही थी लेकिन वे लोग इन मुश्किलों का सामना आये दिन करते थे. अभी दो दिन भी न गुजरे थे कि फिर से इन मैदान में मोहब्बत का रस बरसने लगा. साध्वी को इस बात की भनक लगी तो उन्होंने फिर इस जगह धावा बोल दिया.

सब के सब भाग खड़े हुए. साध्वी को शहर के संस्कारी लोगों में ख़ास पहचान मिल गयी. लोग अब उन्हें अपने घर बुला कर उनका स्वागत करते. उनके प्रवचनों में हजारों की भीड़ लगती लेकिन उस भीड़ में सिर्फ ऐसे लोग होते थे जो पचास की उम्र पार कर गये होते थे.

लेकिन कुछ दिन से एक नौजवान प्रवचन सुनने आने लगा. साध्वी अन्तरा की नजर भीड़ में बैठे उस नवयुवक पर बरबस ही चली गयी. पच्चीस साल की उम्र का खूबसूरत नौजवान. उन सारे सफ़ेद वालों वाले बुजुर्गों में अलग से दिखाई दे जाता था.

मानो बगुलों में हँस आकर बैठ गया हो. लेकिन साध्वी को इस बात से ज्यादा फर्क नही पड़ा. किन्तु नवयुवक नियमित रूप से प्रवचनों में आने लगा तो साध्वी का ध्यान उसकी तरफ जाने लगा. अब हर प्रवचन में साध्वी की नजर उस नवयुवक को ढूढ़ लेती थी. एकाध दिन युवक दो चार मिनट लेट भी होता तो साध्वी को उसके आने तक बैचेनी रहती.

युवक भी प्रवचन सुनते वक्त सिर्फ साध्वी को ही देखता था. उसकी नजर एकपल के लिए भी साध्वी न हटती थी. कभी कभी युवक की एकटक नजर साध्वी को असहज कर देती लेकिन युवक का इस तरह देखना साध्वी को मन ही मन अच्छा भी लगता था.

साध्वी को दिनोदिन उस युवक के बारे में जानने की उत्सुकता होने लगी. किन्तु साध्वी को सीधे उस युवक से कुछ पूछने में भी हिचक होती थी. साध्वी ने अपनी मंडली के एक लडके को ये काम सौप दिया. लडके ने उसी दिन साध्वी को उस युवक के बारे में जानकारी दे दी.

युवक का नाम मनोज था. मनोज काफी अच्छे परिवार से ताल्लुक रखता था. यह सब जानने के बाद साध्वी को सबसे बड़ी उत्सुकता इस बात की हो गयी कि युवक इतने अच्छे घर से हैं और जवान भी फिर प्रवचन सुनने क्यों आता है.

जबकि साध्वी तो नवयुवकों के खिलाफ रहतीं थीं. उनके प्रवचन भी आजकल के लडके लडकियों को कोसते हुए महसूस होते थे. साध्वी की बेकली दिनोदिन बढ़ रही थी जबकि युवक नियमित उसी तरह से उनके प्रवचनों में आ रहा था.

एकबार साध्वी का प्रवचन शहर से दूर एक कसबे में हुआ. युवक उस जगह भी साध्वी का प्रवचन सुनने जा पहुंचा. साध्वी को आश्चर्य होने के साथ साथ अच्छा भी लगा. अब साध्वी अंतरा कहीं भी प्रवचन करतीं तो सबसे पहले उनकी नजर उस छबीले युवक मनोज को ढूढती थी.

मनोज भी सबसे आगे की पक्तियों में जा बैठता था. हालात और ज्यादा बदले. मनोज साध्वी को एकटक देखता तो साध्वी भी उसकी नजरों में खुद को खोया पातीं. कभीकभार तो ये होता कि साध्वी प्रवचनों के बीच में ये भूल जातीं कि उन्हें किस बारे में बोलना है या वो किस बात के ऊपर अपने प्रवचन दे रहीं थीं.

मनोज तो मानो साध्वी का दीवाना सा हो गया था लेकिन साध्वी उससे भी ज्यादा पगली दीवानी. जो प्रेमी जोड़ों को खदेड़ती फिरतीं थीं वो आज खुद किसी की प्रेमिका हुई जातीं थी. घूम घूम कर मोहब्बत के खिलाफ बोलने वाली साध्वी को मनोज से मोहब्बत सी हो गयी थी.

उस छबीले की छाप उनके दिल पर ऐसी छपी कि एक दिन साध्वी ने अपनी मंडली की एक साधिका को भेज मनोज को संदेशा भिजवाया कि वो उन्हें प्रवचन के बाद आकर मिले. मनोज तो मानो इसी दिन का इन्तजार कर रहा था.

साध्वी ने संदेशा तो भिजवा दिया लेकिन प्रवचन के दौरान उनका दिल मील के इंजिन की तरह धडकता रहा. प्रवचन में उनका मन ही नही लगा. प्रवचन खत्म हुआ तो मनोज साध्वी के ठहरे हुए स्थान पर जा पहुंचा.

साध्वी की नजरें उस नौजवान की नजरों से मिलीं तो किसी अबोध कन्या की तरह शरमाकर झुक गयीं. शर्म तो मनोज को भी आती थी लेकिन साध्वी के शर्माने से उसकी शर्म में कटौती हो गयी. कमरे में अकेली बैठी साध्वी और सामने खड़ा मनोज देर तक एकदूसरे से कुछ न कह सके.

आज से पहले साध्वी कभी किसी युवक से इस तरह अकेले में न मिलीं थीं और न ही किसी युवक ने उनके पास आने की हिम्मत ही की थी किन्तु आज का मसला अलग था. साध्वी को ध्यान आया तो उन्होंने सामने पड़ी कुर्सी पर मनोज को बैठने का इशारा कर दिया.

मनोज धीरे से आगे बढ़ कुर्सी पर बैठ गया लेकिन कमरे में फिर भी वैसा ही सन्नाटा पसरा रहा. दिन भर बड बड करने वाली साध्वी की ज़ुवान जमकर रह गयी थी. तभी कमरे में एक साधिका आ गयी. साध्वी ने उसे अपने पास बुला दो चाय बना लाने के लिए कह दिया.

साधिका के जाने बाद फिर से सन्नाटा पसरने को था कि साध्वी सामने बैठे मनोज से बोल पड़ी, “क्या मैं तुमसे कुछ पूंछ सकती हूँ?” यह कहते हुए साध्वी को बहुत हिम्मत जुटानी पड़ी थी. मनोज ने धडकते दिल से साध्वी की और देखा और बोला, “ हाँ क्यों नही. ये मेरा सौभाग्य होगा.

साध्वी ने फिर से हिम्मत जुटाई और बोल पड़ीं, “तुम मेरे प्रवचन सुनने आते हो इस बात का मैं स्वागत करती हूँ लेकिन मेरी समझ में एक बात नही आती. वो ये कि मैं तुम्हारी उम्र के युवकों के कामों की खिलाफत करती हूँ. ये सब जानने के बाद भी तुम नियमित मेरे प्रवचन सुनने आते हो. अगर हो सके मुझे इस बात का जबाब दे दो.

मनोज ने थोड़ी देर सोचा फिर मुस्कुराता हुआ बोला, “साध्वी जी. जब हम लोग छोटे बच्चे होते हैं और उस समय जब बारिश होती है तो हम लोग ये समझते हैं कि ये बारिश भगवान ने सिर्फ हमारे लिए भेजी है. जिससे हम बच्चे लोग बारिश में नहा सकें.

कागज की नाव बनाकर बारिश के पानी में वहा सकें. खूब मजे ले सकें. लेकिन क्या ये बात सच होती है कि बारिश सिर्फ बच्चों के कारण होती है. बारिश तो प्रकृति का एक सामान्य नियम है. उसका होना प्रथ्वी पर सब के लिए होता है. किन्तु बच्चे अपने मन से सोचते हैं लेकिन जैसे जैसे वो बड़े होते हैं उन्हें वही बारिश उम्र के साथ अलग लगने लगती है.

साध्वी ने वेद पुराण पढ़े थे. गीता का अध्ययन किया था. रामायण भी पढ़ी थी लेकिन किसी सवाल का इतना गूढ़ उत्तर भी हो सकता है ये उनको न पता था. किन्तु मनोज के ओज में खोयी साध्वी उसके जबाब को किसी और ही परिदृश्य में देखने लगीं.

उनको लगता था कि मनोज ये कहना चाहता है कि वो उनके प्रवचन सुनने नही उनको देखने आता है. साध्वी के इश्क को और ज्यादा बढ़ावा मिला. अभी वो कुछ कह पातीं उससे पहले ही साधिका चाय बनाकर ले आई. दोनों अनकहे प्रेमियों ने चुपचाप चाय की चुस्कियां लीं. बीच बीच में चोरी चोरी एकदूसरे को देख भी लेते थे.

पहली बार के प्यार की पहली मुलाकात. साध्वी की साधना और उनकी मर्यादा. वो चाहते हुए भी मनोज से ज्यादा बात न कर सकीं. किन्तु उनका दिन आज मनोज की मोहब्बत से भारी हो गया था. जिस दिन मनोज से मुलाक़ात हुई उस रात साध्वी को ठीक से नींद न आई.

सारी रात अपने और मनोज के रिश्ते को लेकर उधेड़ बुन में लगी रहीं. आज उन्हें एहसास होता था कि लडके लडकियाँ क्यों पागलों की तरह इधर उधर भागते फिरते हैं. क्यों वे छुप छुप कर प्यार करते हैं.

अगले दिनों में फिर से साध्वी के प्रवचनों में मनोज का आना होने लगा. अब साध्वी उसको देख प्रवचनों के दौरान भी मुस्कुरा देतीं. मनोज की नजरों से अपनी नजरों को भी मिलातीं. पहले साध्वी दुनिया भर के लोगों को सजने धजने से रोकतीं थीं लेकिन अब खुद सजने संवरने लगीं थी.

वो प्रवचन में बैठे मनोज के सामने खूबसूरत दिखने की भरपूर कोशिश करतीं थीं. लोगों में साध्वी के इस रंग की भी चर्चा शुरू हो गयी किन्तु साध्वी को इस बात से ज्यादा फर्क नही पड़ा.

अब जब भी मौका मिलता साध्वी मनोज को प्रवचन के बाद अपने एकांत स्थान पर बुला खूब बातें करतीं. दोनों की बातें कभी सीधे सवाल का सीधा जबाब न होतीं थी. जब भी दोनों में सवाल जबाब होते तो ऐसा लगता मानो दर्शनशास्त्र का कम्पटीशन चल रहा हो.

मनोज के इश्क में वावली हुई साध्वी अब युवाओं के बारें में न के बराबर बोलतीं थीं. उनको खरी खोटी सुनाना. उनके रहने सहने के ढंग की आलोचना करना तो साध्वी ने कब का बंद कर दिया था. अब तो कभीकभार साध्वी अन्तर प्रेम के ऊपर देर तक प्रवचन देती और ऐसे प्रवचन देते वक्त साध्वी की नजर सिर्फ मनोज को देख रही होती थी.

एक दिन साध्वी को न जाने क्या सूझा. उन्होंने प्रवचन के बाद मनोज को अपने दिल की बात बताने का फैसला कर लिया. जैसे ही प्रवचन खत्म होने के बाद मनोज उनके पास आया तो वे हिम्मत कर मनोज से बोल पड़ी, “मनोज हमें इस तरह बातें करते बहुत दिन हो गये. किन्तु मैं तुमसे वो बात न कह पायी जिसे मैं काफी दिनों से कहने की सोच रही हूँ. अगर तुम्हें बुरा न लगे तो मैं वो बात कह दूँ?”

मनोज का दिल धडक उठा. उसे पता था साध्वी उससे क्या कहेंगी. बोला, “मैं भी कुछ कहना चाहता था लेकिन आपकी ही तरह कह न सका. हम दोनों अपनी बात कहेंगे किन्तु आज नही. और न ही इस जगह. मैं चाहता हूँ कि जो बात में कहना चाहता हूँ उसके लिए ऐसा स्थान होना चाहिए जहाँ बिना डरे या बिना रुके बात कही जा सके. अगर आप चाहे तो हम लोग कहीं दूसरी जगह चलकर...

मनोज की बात पूरी होने से पहले ही साध्वी बीच में बोल पड़ी, “मनोज मैं किसी भी जगह चलने को तैयार हूँ.” मनोज जो चाहता था वो उसे मिल गया था. बोला, “ठीक है तो फिर आप शहर के छोर पर खाली पड़े मैदान के पास वाले बगीचे में कल शाम को पांच बजे आ जाइये. मैं आपको वहीं मिलूँगा.

इतना कह मनोज साध्वी के पास से उठकर चला गया. साध्वी का मन ख़ुशी से झूमा लेकिन उन्हें मनोज की बताई हुई जगह भी याद आ गयी. ये वही जगह थी जहाँ प्रेमियों के झुण्ड इकट्ठे होते थे. जिन्हें साध्वी ने कई बार खदेड़ कर भगा दिया था.

अगले दिन के प्रवचन में मनोज न आया. साध्वी की नजर पूरे प्रवचन में उस छबीले को ढूढती रही. बैचेनी इतनी कि साध्वी ने काफी समय पहले ही प्रवचन समाप्त कर दिया. उन्हें पता था आज मनोज उन्हें बताई हुई जगह पर पांच बजे मिलने आएगा.

साध्वी शाम के पांच बजे से पहले ही अपनी गाड़ी उस जगह ले जा पहुंची जहाँ कभी वो प्यार के पंक्षियों को खदेड़ने आतीं थीं. आज उनके साथ सिर्फ उनका ड्राईवर और एक साधिका थी. जबकि आज से पहले वो पूरी मंडली को लेकर आतीं थीं.

पांच बजने को थे. साध्वी का इन्तजार अपने चरम पर था. आने जाने वाले हर वाहन और हर शख्स पर उन्हें मनोज के आने का आभास होता था. पांच बजे लेकिन मनोज न आया. साध्वी व्याकुल हो उठीं किन्तु तभी एक लड़का साध्वी की गाडी के पास आकर रुक गया.

उसने गाड़ी के पास खड़ी साधिका को साध्वी का नाम लेकर पूंछा. साधिका कुछ कहती उससे पहले ही साध्वी ने उसे बता दिया कि वही साध्वी अन्तरा हैं. लडके ने अपनी जेब से एक चिट्ठी निकाल साध्वी की तरफ बढ़ा दी. साध्वी ने झटपट से चीट्ठी लेली. अभी वो लडके से कुछ पूंछती उससे पहले ही वो वहां से चल दिया.

बिना एक पल की देरी के साध्वी ने चीट्ठी को खोलकर पढना शुरू कर दिया, “पूज्या साध्वी जी. मुझे खेद है कि मैं आपको वादा करने के बाद भी मिलने न आ सका किन्तु ये मेरी मजबूरी है. मुझे उम्मीद है कि आप मुझे इस गलती के लिए माफ़ कर देंगी.

मेरे न आने का कारण भी कोई ज्यादा बड़ा नही है. मैं इसलिए न आ सका क्योंकि मैं जानता था कि आप मुझसे क्या कहना चाहती हैं. आपको मुझसे मुहब्बत हो गयी है. किन्तु मैं आपसे मोहब्बत नही कर सकता.

मैं किसी और से ऐसा करता हूँ. मैंने आपको सिर्फ यहाँ तक इसलिए बुलाया जिससे आपको एहसास हो सके कि लोग यहाँ इस शांत और प्यारी जगह पर क्यों आते थे. जिन्हें आप ने कई बार पशुओं की तरह खदेड़ कर भगाया था.

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आपके द्वारा खदेड़े गये उन्हीं लोगों में से मैं भी एक था. मेरे साथ मेरी हमदम भी थी. उस दिन मुझे आप के प्रति बहुत क्रोध था. मैं आपको एकबार मोहब्बत की आग की तपिश महसूस करना चाहता था.

सच कहता हूँ साध्वी जी मुझे इस बात का स्वप्न में भी यकीन नही था कि आप इतनी जल्दी मुझसे अपना दिल लगा बैठोगी. और सच ये भी है कि मैं भी आपसे एकबारगी अपना दिल लगा बैठा था. मुझे पता नही क्यूँ ऐसा लगा कि आप बहुत प्यारी इन्सान हो.

आप भी उन सब लडकियों में से एक हो जो मोहब्बत के काबिल होती हैं. आपसे भी प्यार किया जा सकता है. मुझे लगता है कि आप अंदर से वैसी नही हो जैसी बाहर से दिखती हो. अगर मैं किसी से मोहब्बत न करता होता तो आपसे शादी भी कर लेता किन्तु आज ऐसा नही कर सकता.

मेरा इरादा तो आपको बदनाम करना था. किन्तु दिल ने मुझे ऐसा करने से रोक दिया. शायद मेरे दिल को आप अच्छी लगती हो. मैं इस शहर का नही हूँ. इस शहर में तो मेरी महबूब रहती है. मैं इस मनभावने बगीचे में उससे मिलने आया था किन्तु आप ने मिलने न दिया.

आज मैं अपने शहर जा रहा हूँ. मैने आपको आपकी उस गलती के लिए माफ़ कर दिया है. मुझे उम्मीद है आप भी मेरी इस गुस्ताखी के लिए माफ़ कर दोगी. लेकिन जाते जाते एक बात कहना चाहता हूँ. साध्वी जी प्यार करने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं. ये आपके प्रवचन या खदेड़ने का तरीका आपको प्यार नही दिला सकता.

प्यार पाने के लिए प्यार करना पड़ता है. प्यार को कमाना पड़ता है. आप पहले प्यार को कमाना सीखिए उसके बाद उजाड़ना. इन्सान की जिन्दगी सिर्फ संस्कृति के चोचलो से नही चलती. जब से दुनिया शुरू हुई तब से प्यार है उसके बाद संस्कृति पैदा हुई.

लेकिन आज मुझे लगता है कि आप पहले से बदल गयी हो. शायद अब कभी आप इस तरह किसी को नही खदेड़ा करोगी. आप खुद एकबार उस बगीचे में घूमकर देखो. शायद किसी इन्सान की याद ताज़ा हो जाय. मैं फिर से एक बार आपसे मिलने आऊंगा लेकिन दिनों बाद. शायद तब तक आप किसी को अपना बना चुकी होओगी.- आपका भक्त मनोज.

पत्र खत्म होते होते साध्वी की आँखें गीली हो गयीं. आज उन्हें सच में वास्तविकता का अनुभव हुआ था. उन्हें लगता था कि आज किसी ने उन्हें भी बगीचे से खदेड़ कर बाहर कर दिया है. साध्वी गाड़ी को बापिस करवा अपने स्थान पर चली गयीं.

उन्होंने फिर कभी किसी प्रेमी युगल को नही कोसा. शहर के छोर वाले मैदान की बगीची फिर से प्रेम परिंदों का घरोंदा बन गयी. साध्वी के प्रवचन का तरीका एकदम से बदल गया. अब वो लोगो को जिन्दगी में सिर्फ एकदूसरे से प्रेम करना सिखातीं थी. उनका कहना था कि इन्सान प्रेम के बिना पिशाच होता है जिसके लिए प्रथ्वी पर कोई स्थान नही.

अगला लेख: घासलेट का घी



भावपूर्ण रचना

शुक्रिया नृपेन्द्र जी.

अलोक सिन्हा
22 जुलाई 2017

कहानी काफी अच्छी लगी | निरंतर लिखते रहिये |

आपका दिल से शुक्रिया सिन्हा साहब. आपकी दुआ रही तो लिखने की कोशिश करता रहूँगा.

बहुत ही पसंद आयी कहानी , धर्मेंद्र जी

आपका बहुत बहुत शुक्रिया प्रियंका जी.

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