गज़ल , वक्त को भी मुस्कुराना चाहिए।।

24 जुलाई 2017   |  महातम मिश्रा   (86 बार पढ़ा जा चुका है)


बेरुखी को भी निभाना चाहिए

हो सके तो पास जाना चाहिए

क्या पता वो बिन पढ़ी किताब हो

खर खबर उनको सुनाना चाहिए।।


बाँचकर मजमून अपने आप से

बेवजह नहिं खौफ खाना चाहिए।।


पूछ लो शायद वे अति अंजान हों

हर शहर को घूम आना चाहिए।।


यदि दिखे हँसती अमीरी दूर से

वक्त को भी मुस्कुराना चाहिए।।


लोग हैं की भाप लेते दिल जिगर

कोहिनूर मिला सजाना चाहिए।।


सोच तो 'गौतम' बहुत पछताएगा

आदमी से मन मिलाना चाहिए।।


महातम मिश्र 'गौतम' गोरखपुरी

मापनी- २१२२ २१२२ २१२

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हार्दिक धन्यवाद आदरणीय, स्वागतम

सुन्दर अभिव्यक्ति, सर|

हार्दिक धन्यवाद आदरणीया, आभार

रेणु
24 जुलाई 2017

आदरणीय मिश्रा जी -- पहले वाली रचनाओं की तरह ही ये रचना भी सरस और सरल है --

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