आयुर्वेद के अनुसार जानिए सेक्स नियम, ज्यादा करना हेल्थ के लिए हो सकता है नुकसानदायक

31 जुलाई 2017   |  अवनीश कुमार मिश्र   (413 बार पढ़ा जा चुका है)

सेक्स के बारे में आयुर्वेद में क्या है। आज हम बात इसी पर करेंगे। पहले ये जानना जरूरी है कि हमारे शरीर में पांच प्रकार की वायु रहती है। इनका नाम है (1) व्यान (2) समान (3) अपान (4) उदान और (5) प्राण। शरीर में जो सेक्सुअल एनर्जी होती है उसके पीछे भी अपान वायु का महत्व होता है। इसका सेक्स से भी संबंध है।


इस वायु का कार्य मल, मूत्र, शुक्र, गर्भ और आर्तव को बाहर निकालना है। जब इस वायु का मूमेंट सही नहीं होता तो मूत्राशय और गुदा से संबंधित रोग होते हैं। अपान वायु शरीर के निचले हिस्से में होती है। अपान वायु माहवारी, प्रजनन और यहां तक कि संभोग को भी नियंत्रित करने का कारक है।


आयुर्वेद में माना जाता है कि हमारे शरीर में सात प्रकार की धातु होती हैं। उसमें से एक है रस धातु। रस या सीरम, खून का सफेद हिस्सा होता है। इस रस से जो तरल पदार्थ आता है उसे शुक्र धातु (स्पर्म) कहते हैं। स्पर्म रस का शोधित या फिर कहें शुद्ध रूप होता है।


आयुर्वेद के अनुसार केवल शुक्र धातु (स्पर्म) ही सबकुछ नहीं होता। इसके अलावा भी एक चीज होती है जो नया जीवन बनाने में मदद करती है। यह स्पर्म में होती है जो हमारे शरीर को नई उर्जा भी प्रदान करती है, उसे कहते हैं ओज। शुक्र धातु बहुत प्रयास और मेहनत के बाद बनती है। इस तरल पदार्थ से भी जो एक रस निकलता है, उसे ओज कहते हैं। यह बहुत पावरफुल होता है। यही एक नए जीवन का आधार होता है।


साइंस में कहा जाता है कि अॉर्गेस्म हमारी बॉडी को लाभ पहुंचाता है। स्ट्रेस कम करने, इम्युनिटी को बढ़ाने, अॉक्सोटोसिन को बढ़ाने और पार्टनर से शारीरिक संबंध का सेंस डेवलप करने में मदद करता है, लेकिन आयुर्वेद में ऐसा नहीं है।

आयुर्वेद का मानना है कि कुछ स्थिति में सेक्स हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाता है। कारण कि सेक्स, वात दोष उत्पन्न करता है। इससे हमारे शरीर में असर पड़ता है। संभोग से उस धातु का नुकसान होता है जो एक महीने की लंबी प्रोसेस के बाद बनता है। इतना ही नहीं संभोग ओज के बनने को भी सीमित करता है। यह अपान वायु में भी गड़बड़ी पैदा करता है।


यौन संबंध बनाने का सबसे अच्छा समय दिन के दौरान, सूर्योदय के बाद सुबह में होता है। हम में से ज्यादातर लोग कभी भी, या रात के समय जब सेक्स पसंद करते हैं, तो यह आयुर्वेद के अनुसार ठीक समय नहीं है।


आयुर्वेद के अनुसार संभोग के लिए सही सीजन सर्दी और बसंत का है। संभोग के लिए गर्मी का समय आयुर्वेद के हिसाब से सही नहीं है। इस दौरान शरीर में ऊर्जा का लगातार उत्सर्जन होता रहता है। ऐसे में सेक्स के लिए अतिरिक्त उर्जा खर्च करना सही नहीं है।


आयुर्वेद के अनुसार जो लोग स्वस्थ्य हैं, उनके लिए सर्दी और बसंत के मौसम में सप्ताह में तीन से पांच बार संभोग करना सही है। वहीं गर्मियों में एक-दो सप्ताह में सिर्फ एक बार संभोग करना चाहिए।

शुक्र धातु के निर्माण के लिए घी, नारियल का रस और दूध को खाना चाहिए। स्नान करने से पहले मालिश करना चाहिए और सेक्स के बाद नहाकर साफ सुथरे कपड़े पहनने चाहिए।

साभार: टाइम्सअॉफइंडिया


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