झोपड़े का मॉनसून

31 जुलाई 2017   |  मनोज कुमार खँसली-" अन्वेष"   (312 बार पढ़ा जा चुका है)

झोपड़े का मॉनसून

सौंधी - सौंधी सी महक है मिट्टी के मैदानों में|

मॉनसून की पहली बारिश है फूस के कच्चे मकानों में|


उसके बदन से चिपकी साड़ी,

माथे से बहकर फैले कुमकुम,

या केशों से टूटकर गिरते मोतियों कि कैसे करूँ बात???...रूमानी अफ़सानों में ?!!!?

जब बैठकर गुजरी है,...यहाँ रात,

भीगने से बचाते बिछौना बच्चे का, ...फूस के कच्चे मकानों में ?!!!?



भीनी - भीनी सी खुश्बू है मय में , मयखानों में |

मॉनसून की पहली बारिश है फूस के कच्चे मकानों में |


उधर हैं ,...वो पकौड़ियों की लज्जत,

वो कचौड़ियों की खसखसाहत,

पास के नुक्कड़ की चाय की दुकानों में,


इधर हैं,... पानी रोकने को बनाते मेढ़ मिट्टी के देहली पर,

और बैठें हैं पाये तक डूबी खाटों पे,..फूस के कच्चे मकानों में?!!!?



भीगी- भीगी रातों में,...ऐसी बरसातों में,...कैसा लगता है इन तूफानों में???

मॉनसून की पहली बारिश है फूस के कच्चे मकानों में|


वहाँ,...बिजली से घबरा,...पिया से लिपटने के बहाने हैं,

बरसात में भीग,...डूबकर रोमांस के कुछ भिन्न ही पैमानें हैं,


यहाँ ,... भरभराकर ढही दीवार से,... दबकर मर गया वो,

बाहर बर्तनों से उड़ेलता पानी,...फूस के कच्चे मकानों में?!!!?


अन्वेष,...मॉनसून की पहली बारिश है फूस के कच्चे मकानों में ?!!!?...


(मनोज कुमार खँसली "अन्वेष" )

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Sudha Devrani
28 अगस्त 2017

लाजवाब.... लाजबाव.....बहुत ही

आपके प्रोत्साहन के लिए सहृदय धन्यवाद् आदरणीया सुधा जी,....आशा करता हूँ भविष्य में भी इसी तरह हौसला अफजाई करती रहेंगी,....आपका बहुत बहुत आभार |

Sudha Devrani
28 अगस्त 2017

लाजवाब....

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द" में सोमवार 28 अगस्त 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com आप सादर आमंत्रित हैं ,धन्यवाद! "एकलव्य"

कृतज्ञता दर्शाने हेतु शब्द नहीं खोज पा रहा हूँ आदरणीय एकलव्य जी,....आपका बहुत बहुत बहुत धन्यवाद् |

कुसुम लता
11 अगस्त 2017

अन्वेष मॉनसून की पहली बारिश है फूस के कच्चे मकानों में गज़ब लिखते हैं आप अब और क्या कहूँ निशब्द कर दिया आपने ऐसा प्रतीत होता है जैसे जाने कितने दर्द समेटे बैठें हैं आप | एक एक पंक्ति ऐसा जान पड़ता है जैसे आपने स्वयं जी हो |बहुत ही उम्दा श्रेणी की कविता है |

बहुत बहुत बहुत आभार कुसुम जी|

सच लिखा है , यही हकीकत है आज . समाज के दो चेहरे दिखा दिए

बहुत बहुत बहुत सहृदय आभार प्रियंका जी |

बहुत खूब सर

बहुत बहुत बहुत धन्यवाद् उमा सर

रेणु
31 जुलाई 2017

मनोज जी -- विपन्नता से भरे समाज में ऐसे अनेक चित्र मिल जाते हैं जो मन को विदीर्ण कर जाते हैं | आपने फूस की झोंपड़ी के मॉनसून को बहुत ही ही सुघड़ता और भावुकता से शब्दों में उकेरा है | विपन्न और संपन्न समाज में धरती आसमान का फर्क सदियों से रहा है | अपनी व्यर्थ की औपचारिकताओं में उलझा समाज कहाँ किसी का दर्द समझ पाता है ? ऐसे लोगों की व्यथा देख स्वयम की सुविधा सम्पन्नता पर संकोच होता है | मन को भिगोती रचना बहुत प्रशंसनीय है आप को मेरी हार्दिक शुभकामना --

आदरणीया रेणु जी,......आपकी सूक्ष्म व सटीक टिप्पणी हेतु बारंबार करबद्ध आभार,.....उम्मीद रखता हूँ,...आगे भी इसी तरह उत्साहवर्द्धन करती रहेंगी|

सत्य , ग्रामीण परिवेश में आज भी ऐंसे दृश्य मिल जाते हैं

सर, आपके बहुमूल्य प्रोत्साहन हेतु सहृदय धन्यवाद् ,आशा करता हूँ भविष्य में भी यूँ ही हौसला अफ़्जाई रहेंगे|

असली ज़िन्दगी

बहुत बहुत बहुत सविनय आभार सर.

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