कहना चाहता हूँ कुछ ऐसा

11 अगस्त 2017   |  मनोज कुमार खँसली-" अन्वेष"   (369 बार पढ़ा जा चुका है)

कहना चाहता हूँ कुछ ऐसा

भावार्थ - यहाँ रचियता अपनी प्रेयसी के हृदय में अपना घर करने की चाह में नाना प्रकार की उपमाओं का प्रयोग कर रहा है|


कभी वह उससे चाँद, तारों, स्वप्नों, कल्पनाओं की बात कर उसके मन में अपने लिए जगह बनाना चाहता है| कभी इस हेतु वह माँ के प्रति बच्चों के तिरस्कारपूर्ण व्यवहार की बात का प्रयोग कर उसके हृदय पर अपनी अमिट छाप छोड़ने की अभिलाषा भी लिए बैठा है |


कभी वह इसके लिए प्रातः कालीन ओंस का उदाहरण देकर हरी घास के ऊपर उसकी मोती सी चमक का बख़ान करता है| तो अगले ही क्षण उन सुन्दर चमकते मोतियों के ऊपर निर्ममता से उन्हें कुचलते हुए आगे बढ़ते चले गए पद चिन्हों की बात कर उसे प्रभावित करने की कोशिश करता है|


कभी रोशनी के बिम्ब को सूर्य बता अपने घर को खुशियों के लिए तरसता दिखा कर प्रेयसी की सहानुभूति चाहता है |


तो कभी समुद्र से छिटक - कर तड़पती मछली की सुंदरता का बख़ान कर या पानी से दूर हो जाने पर उसके छटपटाकर निकलते प्राणों का वर्णन कर प्रेमिका के मन में अपने प्रति संवेदनशीलता पैदा करने का प्रयत्न करता है |


इन सब उपरोक्त प्रयासों के तदुपरांत रचयिता विचारता है, कि मैं जिन भिन्न-भिन्न उपमाओं द्वारा जिस हेतु प्रयत्नरत हूँ अर्थात अपनी प्रेयसी का हृदय विजित करना | वह कर पा रहा हूँ क्या ?... अथवा कहीं ऐसा तो नहीं मैं जो कहना चाह रहा हूँ उसे कह पाने में अथवा वह (प्रेयसी) समझ पाने में समर्थ है भी या नहीं ?... फिर अगले ही क्षण रचयिता अनुभव करता है कि प्रेयसी बहुत देर से सब कुछ सुन निःशब्द / चुपचाप उसके समक्ष/समीप बैठी है| कहीं यही उसकी मौन स्वीकृति तो नहीं उससे प्रेम की ???... कहना चाहता हूँ कुछ ऐसा,...




अन्वेष,...कहना चाहता हूँ कुछ ऐसा ,...

कि छू सकूँ उसके मन को,...

करूँ बात चाँद की, तार्रों की,

स्वप्नों की,कल्पनाओं की,

या फिर करूँ बात,...

घर के कोने में पड़ी उपेक्षित माँ की ?!!? ...

कहना चाहता हूँ कुछ ऐसा,...


चाँद से टपकी ओंस की बूँद हूँ मैं,

जिसे सँभाला है तृणों ने अपने शिरों पर,

करूँ बात उसकी चमक की,

आकर्षण की,कशिश की,

या फिर करूँ बात,...

निर्ममता से आगे बढ़ते चले गए क़दमों के निशाँ की ?!!?...

कहना चाहता हूँ कुछ ऐसा,...


बंद अँधेरे कमरे में दरवाजे के छेद से रिसकर ,

दीवार पर पड़ता रोशनी का बिम्ब हूँ मैं,

जिसे भ्रम है अपने भानु होने का,

करूँ बात उसके तेज की,

ओज की, ताप की,

या फिर करूँ बात,...

अँधेरे से घिरे मायूस मकाँ की ?!!?...

कहना चाहता हूँ कुछ ऐसा,...


पयोधि से छिटककर तड़पती मीन हूँ मैं ,

जिसे प्यास है जलधि की एक बूँद की,

करूँ बात उसके रेती से लिपटकर थिरकते नृत्य की,

चमचमाती देह की, या उस पर फिसलते नीर की,

या फिर करूँ बात,...

पानी की एक बूँद के लिए छटपटाकर निकलती जां की ?!!? ...

कहना चाहता हूँ कुछ ऐसा ,...


फिर सोचता हूँ !

कहना चाहता था जो कह पा रहा हूँ क्या ?!!!?

कहीं ऐसा तो नहीं

मैं खोद रहा हूँ गढ्ढ़ा मकाँ की नींव के लिए,

और वो आकर मुझसे बोले,

यूँ तन्हाँ खोदने से पानी न निकलेगा ?!!!?

या फिर उसका सब कुछ जान लेना ही ,...

मौन अभिव्यक्ति तो नहीं हाँ की?!!!?...

कहना चाहता हूँ कुछ ऐसा,...



( मनोज कुमार खँसली "अन्वेष" )












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पयोधि से छिटक कर,,,,, बहुत सुंदर रचना मित्र।

बहुत ही सुन्दर रचना. भावनाओं को झगझोड़ दिया सर् . कीप इट अप विथ सेम जील एंड डेडिकेशन्स.

बहुत बहुत धन्यवाद् सर प्रोत्साहन हेतु

रेणु
14 अगस्त 2017

आदरणीय मनोज जी वाह और सिर्फ वाह !!!!!!!!!!! कितनी सुंदरता से उकेरा है आपने मन की महीन भावनाओं को !!!!!! और अपना पक्ष मजबूत आधार के साथ रखा है | आपकी लेखनी की प्रांजलता और सहृदयता बनी रहे मेरे बन्धु !! बहुत शुभकामनाये --------

कुसुम लता
11 अगस्त 2017

वाह वाह मनोज जी क्या बात है आपकी, सूक्ष्म से सूक्ष्म कल्पनाओं को शब्दों में ढाल बेहतरीन तरीके से पेश करने में आपका कोई सानी नहीं, अपने प्रेम की अभिव्यक्ति इतनी अदभुत व उम्दा शैली में पढ़ने को विरल ही मिलती है

आदरणीया कुसुम जी रचना के मूलभाव को समझ उस पर आपकी अमूल्य टिप्पणी से में धन्य हो गया, अपनी कृतज्ञता का शब्दों में बखान नहीं कर पा रहा हूँ | प्रोत्साहन हेतु आपका बहुत बहुत बहुत धन्यवाद् |

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