“दोहा-मुक्तक”

18 अगस्त 2017   |  महातम मिश्रा   (183 बार पढ़ा जा चुका है)

“दोहा-मुक्तक”


नित मायावी खेत में, झूमता अहंकार।

पाल पोस हम खुद रहे, मानों है उपहार।

पुलकित रहती डालियाँ, लेकर सुंदर फूल-

रंग बिरंगे बाग से, कौन करे प्रतिकार॥-१


पक्षी भी आ बैठते, तकते हैं अभिमान।

चुँगने को दाना मिले, कर घायल सम्मान।

स्वर्ण तुला बिच तौल के, खुश होत अहंकार-

चमक धमक नजरें चढ़ा, को ताके अपमान॥-२


महातम मिश्र ‘गौतम’ गोरखपुरी

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