ग़ज़ल

24 अगस्त 2017   |  महातम मिश्रा   (334 बार पढ़ा जा चुका है)

ग़ज़ल

"गज़ल" तुझे दर्द कहूँ या खुशी आंखों को चुभी बेवशी छुट हाथ ले लो तिरंगा अभी उम्र है, कि बदनशी।। भूख आजादी गरीबी आहत आँसू है कि हँसी।। भूख पक गई इक रोटी बता कैसी है खुदकशी।। निहार तो इनका बचपन किधर ले आई मयकशी।। ध्वज रोहण वंदे मातरम जय जय जय स्वतंत्र वर्षी।। 'गौतम' ये दृश्य तो देख कोमल अंकुर पथ अरि सी।। महातम मिश्र 'गौतम' गोरखपुरी

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महातम मिश्रा
02 सितम्बर 2017

सादर धन्यवाद आदरणीया रेणु जी, जी देखा बहुत खुही हुई आभार महोदया

रेणु
01 सितम्बर 2017

आदरणीय मिश्रा जी ------ जो लिंक ध्रुव जी ने दिया है -------- उसे लिंक करें | यदि नहीं होता तो कृपया गूगल पर लिख दे वहां से मिल जाएगा | और २८ अगस्त वाले में खुद को ढूंढे | यहाँ रोज की सर्वश्रेठ तम पञ्च रचनाएँ चुनी जाती हैं ------ और उन्हें ब्लॉग जगत से परिचित कराया जाता है आप जरूर देखे मेरा विनम्र आग्रह है |

अति सुन्दर अभिव्यक्ति सर |

हार्दिक धयवाद सर

रेणु
30 अगस्त 2017

आदरणीय मिश्रा जी------------ बहुत बधाई आपकी रचना पञ्च लिंकों में गयी ----- पर आप वहां नहीं आये कृपया जूर देखें सादर सस्नेह शुभ कामना

सदर सादर धन्यवाद आदरणीय रेनु जी, मै इधर कुछ व्यस्त था, रचना पंचजय में गई, समझा नहीं, मुझे कहाँ आना था, कृपया समुचित प्रकाश डालें


आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द" में सोमवार 28 अगस्त 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com आप सादर आमंत्रित हैं ,धन्यवाद! "एकलव्य"

हार्दिक आभार आदरणीय क बहुत खुसी हुई हार्दिक आभार

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30 अगस्त 2017
"गज़ल" देखता हूँ मैं कभी जब तुझे इस रूप में सोचता हूँ क्यों नहीं तुम तके उस कूप में क्या जरूरी था जो कर गए रिश्ते कतल रखके अपने आप को देखते इस सूप में।। देख लो उड़ गिरे जो खोखले थे अधपके छक के पानी पी पके फल लगे बस धूप में।। छोड़ के पत्ते उड़े जो देख पीले हो गए साख से जो भी जुड़े हैं सभी उस रूप में।।
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23 अगस्त 2017
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