लेख-- राजनीतिक उदासीनता के शिकार गांव और ग्रामीण

31 अगस्त 2017   |  महेश तिवारी   (369 बार पढ़ा जा चुका है)

भारत की दो तिहाई आबादी अगर जेल से भी कम जगह में रह रही है। तो ऐसे में निजता के मौलिक अधिकार बन जाने के बावजूद छोटे होते मकान और रहवासियों की बढ़ती तादाद प्रतिदिन की निजता को छीन रही है। जिस परिस्थिति में देश में सबको घर उपलब्ध कराने की बात सरकारें कह रही हैं। उस दौर में देश की आबादी का अधिकांश हिस्सा जेल में एक कैदी के लिए तय की गई मानक जगह से भी कम में गुजारा करने को मजबूर है। फ़िर बढ़ती जनसंख्या को क़ाबू करने पर भी विचार करना होगा? मॉडल प्रिजन मैनुअल 2016 के मुताबिक जेल की कोठरियों के लिए 96 वर्ग फुट जगह तय की गई है, ऐसे में अगर देश के लगभग 80 फ़ीसद लोग शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में औसतन 94 वर्ग फीट या उससे कम जगह में जीवन बीता रहे हैं। वैसी स्थिति में विकास के सारे वायदे धरे के धरे रह जाते हैं। नेशनल सैंपल सर्वे की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश में लोगों के घर और जेल के कमरे एक बराबर हैं। रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 80 फीसदी गरीब ग्रामीण परिवारों के घरों का औसत जमीनी क्षेत्र 44.9 वर्ग फुट से कम या इसके बराबर है। क्योंकि ग्रामीण इलाकों में औसत घरेलू परिवार में 4.8 लोग होते हैं। इसका सीधा निहितार्थ यही है, कि प्रति व्यक्ति 94 वर्ग फुट या उससे कम जगह प्रतिव्यक्ति उपलब्ध है। एक अनुमान के मुताबिक देश में दो करोड़ से अधिक लोग छत के लिए मोहताज हैं। ऐसे में सरकार का दावा कि वह 2022 तक सबको मकान मुहैया कराने के लक्ष्य पर काम कर रही है। वह पूर्ण होता नहीं दिखता। भारत की गरीब आवाम कुछ नैसर्गिक मूलभूत आवश्यकताओं से आज़ादी के बाद से जूझता आ रहा है। जो अभी तक मयस्सर नहीं हो पाई। तमाम सरकारे बदली, बदली सरकारी नीतियां। तंत्र बदल गया और कार्य करने की परिपाटी। सभी दलों की सरकारें आई। जिसमें सभी महापुरुषों के विचारों को मनाने वाली सरकार का गठन हुआ। अगर देश मे कुछ ज्यादा बदलाव नहीं दिखा, तो वह है, गांव- गरीब की दुर्दशा। आज भी देश के आबादी का बड़ा हिस्सा रेलवे लाइन के इर्दगिर्द झुग्गी -झोपड़ियों में रैनबसेरा बनाकर रहने को बेबस और विवश है। सरकार निजता का अधिकार दिलाकर अपनी पीठ ठोक रही है। अन्य मूल अधिकारों पर बहस कब होगी? आज दुनिया बदल रही है। फ़िर भी देश के साढ़े 6 लाख ग्रामीण जस के तस टिके हुए हैं। डिजिटल इंडिया, न्यू इंडिया, सांसद आदर्श ग्राम योजना, सबको घर दिलवाने की बात। ये देश की आज़ादी के बाद वर्तमान भारत की नई विकासशील देश की चुनावी रेवड़ी है। जिसके बल पर देश की राजनीति का लगभग एक दशक की रूपरेखा का खाँचा तैयार किया जा रहा है। आज़ादी के सत्तर वर्ष, हज़ारों लोकलुभावन योजनाओं का एलान। स्थिति में बदलाव कुछ ही दिखा। देश के गरीबीयत की सीमा 30 से 32 रुपये में सीमित कर दी गई। ऐसे में बहुतेरे सवालों का हुजूम खड़ा होता है। देश में एक वर्ग ऐसा भी है, जिसे लाखों रुपये कम पड़ रहें हैं, फ़िर गरीबी की सीमा 32 रुपये में क्यों खींची जा रही है? जहां देश में बहुमंजिला इमारतों की जद बढ़ रहीं है, ऐसे में गरीब और आवश्यक लोगों को दो कोठरी का झोपड़ा क्यों हमारी व्यवस्था उपलब्ध नहीं कर सकी? सवाल की फ़ेहरिस्त लंबी है, उत्तर मिलना ज्यादा कठिन नहीं है। देश में सामन्तवादी व्यवस्था भले ख़त्म हो गई। लेकिन सामाजिकता को ताक पर रखकर अपनी झोली भरने वाले हुक्मचंद देश में अभी भी व्याप्त हैं। 2011 के सामाजिक-आर्थिक जनगणना के आंकड़े बताते हैं, कि विकास की गंगा अभी गांव तक नहीं पहुंची है। तभी तो 2011 तक देश में कुल 24.39 करोड़ घरों में से 17.91 करोड़ ग्रामीण घर हैं। स्थिति विकट और दयनीय तब और हो जाती है। जब यह पता चलता है, कि इन घरों में से लगभग 48 फीसद किसी न किसी अभाव से घिरे हुए हैं। इसी आंकड़े के मुताबिक गांव का हर तीसरा परिवार भूमिहीन है व आजीविका के लिए शारीरिक श्रम पर निर्भर है। ऐसे में कैसे माना जाए, कि विकास की गाथा के सोहर जिस तरह से गाया जा रहा है। उसमें गांव और ग्रामीण संरचना को भी सम्मिलित किया गया है? आदर्श ग्राम योजना की धाक सत्ता के हनक में शुरुआती दौर में ख़ूबी सुनाई पड़ी। वर्तमान में उसकी चमक भी फ़ीकी पड़ चुकी है। तीसरे वर्ष सांसद गांव को गोद लेने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे। हमारे लोकतांत्रिक परिवेश का दुखड़ा यही है, सत्ता मिलते ही देश बदल देने की क्षमता का प्रदर्शन होता है, लेकिन धीरे-धीरे यह उतावलापन गायब हो जाता है। सामाजिक-आर्थिक जनगणना - 2011 के आंकड़े के मुताबिक देश के गांवों में लगभग 2.37 करोड़ परिवार को एक कमरे का मकान ही मयस्सर हो पा रहा है। और ऐसे में अगर देश के गांवों के चार फीसद से अधिक परिवार भीख मांगने, कचरा उठाने और मांगकर खाने पर विवश हैं। फ़िर समस्या भयावह दिखती है। जिससे देश की हुक्मरानी व्यवस्था भी नज़र चुराती मालूमात पड़ती है। वास्तव में देश वैश्विक परिपेक्ष्य में उन्नति कर रहा है। वह जरूरी भी है। लेकिन यह उन्नति अगर अपने वास्तविक स्वरूप को भुलाकर हो रही है। फ़िर यह देश का दुर्भाग्य है। गांव का देश कहे जाने वाले देश में आज गांव ही सरकारी अनदेखी का शिकार हैं। आज वैश्विक दौर में जब दुनिया चमक-दमक में जी रही है। उस काल-खंड में देश की ग्रामीण व्यवस्था कहाँ जीने को विवश है। उसको देखने की जुर्रत देश के न राजनेता करना चाहते है, न नीतियों को निर्धारित करने वाले। अमेरिका की वर्ल्ड वॉच इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट कहती है, कि भारत में गांवों का समुचित विकास न होने का एक अहम कारण कृषि आबादी में तेजी से वृद्धि होना है। साल 1980 से 2011 के बीच भारत की कृषक आबादी में भारी बढ़ोतरी हुई है। अब अगर विदेशी रिपोर्ट यह कहती है, कि कृषि में लोगों का झुकाव होने से गांव पिछडेपन का शिकार हो रहा है। फ़िर निष्कर्ष पानी की तरह साफ़ है, कि कृषि का पिछड़ापन गांव को भी पिछड़े पन की तरफ धकेल रहा है। तो ऐसे में अगर न रोजगार है, न सरकारी नौकरी फ़िर देश की ग्रामीण आवाम करें, क्या इसका उत्तर देगा कौन? आज देश में आधारभूत सुविधाओं शिक्षा, स्वस्थ, कृषि का मुद्दा गूढ़ हो चुका है। सरकारी तालमेल के अभाव और ढिलमुल रवैये के कारण सबको आवास उपलब्ध कराने की सरकारी योजना भी अधर में ही अटककर रह सकती है। इसलिए सरकार को नीतियों में सुधार करना होगा। तभी गांव और ग्रामीण संरचना में कुछ बदलाव दिख सकता है।

अगला लेख: लेख-- आज़ादी के साथ अपने दायित्वों और संवैधानिक कर्तव्यों को समझें



रेणु
02 सितम्बर 2017

सारगर्भित लेख बिलकुल सही लिखा है ------

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
03 सितम्बर 2017
ले
भारत परम्पराओं और त्योहारों का देश है। हमारी संस्कृति के परिचायक यहीं तीज-त्यौहार हैं। आज त्योहारों की आड़ में हुलड़बाजी समाज में पनप रहीं है। गणेश पूजन की बात हो, या किसी अन्य त्यौहार की क्या उसकी मूल भावना समाज में जीवित है। इस पर गौर करना चाहिए। क्या गणेश उत्सव को
03 सितम्बर 2017
02 सितम्बर 2017
ले
गोरखपुर के चर्चे सियासी गलियारों में तेज़ है। तो उसी गोरखपुर के चर्चे जनमानस के जुबां पर भी है। अगस्त महीने के शुरुआती दौर में 60 बच्चों की मौत ने लोंगो को अचंभित कर दिया था। अब जब महीने के आखिर में भी 42 मौत हो गई । तो जनता के पैर के नीचे से जमीं खिसक रहीं है। इसके अलावा वह हतप्रभ, और व्याकुल हो उठी
02 सितम्बर 2017
28 अगस्त 2017
ले
आज की नजाकत में धर्म पर हावी विज्ञान है। फ़िर भी धर्मांधता का चश्मा समाज पर चढ़ा है। सत्ता का तख़्त सजाती जनमानस है। जनमानस और सियासी रणबाकुरों की फ़ौज लिपटी एक बाबा के चरणों में है। आज देश में न्यू इंडिया का तासा पीटा जा रहा है, क्या न्यू इंडिया में जनमानस धर्मांधता का दामन ओढ़कर और सत्ता बाबाओं की जूती
28 अगस्त 2017
07 सितम्बर 2017
संविधान में मीडिया को लोकतंत्र को चौथा स्तम्भ माना जाता है। इस लिहाज से मीडिया का समाज के प्रति उत्तरदायित्व और जिम्मदरियाँ बढ़ जाती हैं। मगर क्या वर्तमान वैश्विक दौर में जब कमाई का जरिया बनकर मीडिया रह गया है। वह समाज के प्रति अपने दायित्वों का सफल निर्वहन कर पा रहा है। उत्तर न में ही मिलेगा, क्योंक
07 सितम्बर 2017
10 सितम्बर 2017
ले
आज समाज की स्थिति में असामाजिक तत्वों का समावेश अधिक होता जा रहा है, फिर हम नए भारत का निर्माण किसके लिए कर रहें हैं? जब देश के वर्तमान ही भविष्य के लिए सुरक्षित नहीं, फ़िर क्या बात की जाए? किस संस्कृति और आचरण को महत्व दिया जाए? इस बाज़ार में सब नंगे नजऱ आ रहें हैं। आज समाज को हवशीपने का जो ज्वार लगा
10 सितम्बर 2017
20 अगस्त 2017
पेंशन मिल जाने के बाद बैंक की रोज़मर्रा की व्यस्तता ख़त्म हो गई. अब नाश्ते का समय 8 बजे से खिसक कर 9 बजे पहुँच गया. अखबार जो कभी दस मिनट में निपट जाता था अब दो तीन घंटों तक खींचता चला जाता है. दफ्तर जाना नहीं तो क्या जूते चमकाने और क्या टा
20 अगस्त 2017
01 सितम्बर 2017
बुद्ध का जन्म ईसापूर्व 563 में हुआ और महानिर्वाण ईसापूर्व 443 में. 29 की आयु में महल और परिवार त्याग कर वन की ओर प्रस्थान किया और 6 वर्ष तक सत्य की खोज में लगे रहे. उस समय वेद, पुराण और उपनिषद का प्रचलन था. साथ ही नास्तिकवाद भी प्रचलित
01 सितम्बर 2017
29 अगस्त 2017
ले
आज एक बड़ी घटना बाज़ार का हिस्सा बनती जा रहीं है। वह है, पोर्टिबिलिटी। मोबाइल नंबर पोर्टिबिलिटी, बैंक पोर्टिबिलिटी। क्या शिक्षा के स्तर पर भी पोर्टिबिलिटी की सुविधा से सकारात्मक असर दिख सकता है? जवाब उत्तरित नहीं, लेकिन आज गाड़ी मझधार में हो, तो सभी घोड़े खोल देने चाहिए। तो क्या हमारी हुक्मरानी व्यवस्था
29 अगस्त 2017
29 अगस्त 2017
ले
संयुक्त राष्ट्र की तरफ से आई एक रिपोर्ट में विस्थापन को लेकर खुलासा हुआ हैं, वह देश की व्यवस्था और लोगों की सोच में बदलाव की तरफ़ इशारा करती है , कि अब प्राकृतिक संरक्षण के प्रति सचेत हो जाओ। इस रिपोर्ट के तहत यह पता चलता है, कि देश में पिछले वर्ष आपदाओं और पहचान के साथ जातीयता की जकड़न से आज़ादी के सा
29 अगस्त 2017
29 अगस्त 2017
ले
देश में तीव्र गति से बच्चों का झुकाव आक्रमक रवैये और अन्य असामाजिक कार्यों में लग रहा है। जिसका अहम कारण बच्चों की खेलों के प्रति बढ़ती दूरी भी है। आज के समाज में बच्चा जहां घर में माता-पिता की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में अकेलेपन का एहसास करता है, वहीं खेलों से बढ़ती दूरी उसके मानसिकता के विकास को भी अवरुद
29 अगस्त 2017
04 सितम्बर 2017
ले
गुरुर ब्रह्मा गुरुर देवो महेश्वरा गुरुर साक्षात परब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नमः आज यह उक्ति हमारे शैक्षिक परिवेश में शिक्षकों और छात्रों के बीच क्रियान्वित होती नहीं दिखती। आज शिक्षक और छात्रों के बीच खाई गहरी होती जा रहीं है। गुरु हमारे पुनर्जन्म का गर्भ होता है जहां से हमारा सही अर्थों में दोबारा ज
04 सितम्बर 2017
30 अगस्त 2017
देश में आज के दौर में कोई सबसे बड़ा बदलाव दिख रहा है। तो वह 1400 वर्षों बाद देश में मुस्लिम महिलाओं की सुदृढ़ होती सामाजिक स्थिति की ओर बढ़ता क़दम। महिलाएं जो सामाजिक औऱ धार्मिक प्रथा के नाम पर सामाजिक बुराई रूपी तीन तलाक के दंश से पीड़ित थी, उस समस्या से निजात दिलाने का प्रयास सार्थक रहा। अब इस समस्या
30 अगस्त 2017
29 अगस्त 2017
ले
देश में तीव्र गति से बच्चों का झुकाव आक्रमक रवैये और अन्य असामाजिक कार्यों में लग रहा है। जिसका अहम कारण बच्चों की खेलों के प्रति बढ़ती दूरी भी है। आज के समाज में बच्चा जहां घर में माता-पिता की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में अकेलेपन का एहसास करता है, वहीं खेलों से बढ़ती दूरी उसके मानसिकता के विकास को भी अवरुद
29 अगस्त 2017
सम्बंधित
लोकप्रिय
रे
08 सितम्बर 2017
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x