गीत

04 सितम्बर 2017   |  अलोक सिन्हा   (64 बार पढ़ा जा चुका है)

जिस देश में शिक्षक का मन घायल हो ,

उसका तुम भविष्य अँधेरे में समझो |


शिक्षा तो है आधार जिन्दगी का ,

इससे ही हर व्यक्तित्व निखरता है |

गांधी टैगोर विवेकानंद जैसा ,

मन पावन आदर्शों में ढलता है |

जिस देश में जर्जर , दिशा हीन शिक्षा ,

उस देश को दुःख के घेरे में समझो


ऐ बी सी डी को सम्मानित आसन ,

लेकिन क ख ग हर जगह उपेक्षित हों |

वह देश छुयेगा नील गगन कैसे ,

हर प्रतिभा पक्षपात से बाधित हो |
जो देश स्वार्थ लिप्सा में बस डूबा ,

उसका प्रभात तुम कोहरे में समझो


छल को तो सारे दुर्लभ सुख सम्भव ,

पर श्रम पल भर मुस्कानों को तरसे |

चेतना भटकती सूनी सड़कों पर ,

वाचालों के घर मधुवन से हर्षे |

जिस देश में ऐसी विषम नीतियाँ हों ,

उसका सद्चरित्र तुम खतरे में समझो |


रचना ---- ४ सितम्बर १९९०

अगला लेख: गीत ----- मन तो पहले ही घायल था --



रवि कुमार
04 सितम्बर 2017

वाह आलोक जी , सच लिखा है

अलोक सिन्हा
05 सितम्बर 2017

बहुत बहुत आभार रवि जी |

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