रे दरपन .....

08 सितम्बर 2017   |  मदन पाण्डेय 'शिखर'   (186 बार पढ़ा जा चुका है)

रे दरपनरे दरपन, तू फिर इतना उदास क्यों है,

ऋतु बदली है, पगले निराश क्यों है,

फिर पुरवाई महकी बासंती आ गई ,

फिर थकी –थकी सी यह सांस क्यों है,

चेहरे पर गुलाबी गंध महकी-महकी है,

मयूर संग आम्रपाली फिर प्यास क्यों है ,

झुरमुट मालती के , रात-रानी संग,

अश्क यह मुरझाया सा पलास क्यों है,

चांदनी सितारों को निहारती झूमी है,

जीता तू ही तो पगले, बिखरा ताश क्यों है,

रे दरपन, तू फिर इतना उदास क्यों है,

मदन पाण्डेय ' शिखऱ '

अगला लेख: आँसुओं के भी दाम



सादर धन्यवाद ,,, बहिन जी ।

priyankamani
10 सितम्बर 2017

bahut hi sundar rachna hai bhaiya

बहुत सुंदर रचना।

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x