आँसुओं के भी दाम

09 सितम्बर 2017   |  मदन पाण्डेय 'शिखर'   (55 बार पढ़ा जा चुका है)

आँसुओं के भी दाम

लब्ज़ खुद ही बयान होते हैं,

आँसुओं के भी दाम होते हैंI

पंछी, रोको तो दौड़ते बादलों को,

व्योम में कहाँ विराम होते हैं I


चाँद तारों की दोस्ती रात भर,

जुगनुओं के तो नाम होते है I

दुपहरी धूप, जिश्म की जलन,

जैसे वर्षों की थकान होते हैं I


अर्श पर चाँदनी,त्रण पर मोती,

बस पलों के पैगाम होते हैं I

रुंधे हुए कंठ से निकले हुए गीत,

गुन-गुनाने को जुबां होते हैं I


उम्र भर तराशे बुतों के अश्क,

उदास चेहरों की पहचान होते हैं I

मुस्कराने के पल आम होते हैं,

आँसुओं के भी दाम होते हैं I

अगला लेख: रे दरपन .....



आलोक जी बहुत - बहुत धन्यवाद ।

अलोक सिन्हा
09 सितम्बर 2017

शिखर जी ! बहुत अच्छी रचना है | शुभ कामनाएं |

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