“दोहा मुक्तक”

28 सितम्बर 2017   |  महातम मिश्रा   (121 बार पढ़ा जा चुका है)

 “दोहा मुक्तक”

“दोहा मुक्तक”


यह तो प्रति हुंकार है, नव दिन का संग्राम।

रावण को मूर्छा हुई, मेघनाथ सुर धाम।

मंदोदरी महान थी, किया अहं आगाह-

कुंभकर्ण फिर सो गए, घर विभीषण राम॥-१


यह दिन दश इतिहास में , विजय पर्व के नाम।

माँ सीता की वाटिका, लखन पवन श्रीराम।

सेतु बंध रामेश्वरम, शिव मय राम महान-

लंका नगरी राक्षसी, टिके न पापी नाम॥-२

दश दश माथ दशानना भुजा बीस बेकार।

अमृत नाभि निहारता, लेकर वर नादार।

छल कल मन भरता गया, भक्त प्रथम लंकेश-

था अति प्रिय कैलाश का, खंडित किया करार॥-३


धन्य कोशलाधीश प्रभु, पहुँचे सरयू तीर।

माता कौशल्या मिली, भ्राता भरत अधीर।

अगवानी में सज गई, अवली दीप कतार-

नवरात्रि सुख संपदा, दीपावली अमीर॥-४


तरह तरह व्यंजन भरे, शुद्ध स्वाद पकवान।

सजे कार्तिक व्याहता, घर तुलसी धनवान।

नित्य साँझ दीपक जले, पूनम को बारात-

शरद ऋतू अति पावनी, माँ महिमा पहचान॥-५


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: “दुर्मिलसवैया”



महातम मिश्रा
10 अक्तूबर 2017

सादर धन्यवाद आदरणीया रेणु बाला जी, बहुत बहुत बधाई आप को और पुरे परिवार को.....

रेणु
29 सितम्बर 2017

-------- आदरणीय मिश्रा जी --------- आपने तो रामायण का एक हिस्सा अपनी रचना में सजीव कर दिया | बहुत खूब !!!!!!!!!!!!!! आपको विजयादशमी की अनेकानेक मंगल कामनाएं प्रेषित करती हूँ -------------

रेणु
29 सितम्बर 2017

-------- आदरणीय मिश्रा जी --------- आपने तो रामायण का एक हिस्सा अपनी रचना में सजीव कर दिया | बहुत खूब !!!!!!!!!!!!!! आपको विजयादशमी की अनेकानेक मंगल कामनाएं प्रेषित करती हूँ -------------

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