कभी सोचता हूँ कि

29 सितम्बर 2017   |  शिवदत्त   (119 बार पढ़ा जा चुका है)

कभी सोचता हूँ कि

कभी सोचता हूँ कि
जिंदगी की हर साँस जिसके नाम लिख दूँ
वो नाम इतना गुमनाम सा क्यों है ?

कभी सोचता हूँ कि
हर दर्द हर शिकन में, हर ख़ुशी हर जलन में
हर वादे-ए-जिंदगी में, हर हिज्र-ए -वहन में
जोड़ दूँ जिसका नाम, इतना गुमनाम सा क्यों है ?

कभी सोचता हूँ कि
सुबह है, खुली है अभी शायद आँखें मेरी
लगता है पर अभी से शाम क्यों है
फिर सोचता हूँ वजह, तेरा चेहरा नजर आता है
चेहरा है, पर नाम गुमनाम सा क्यों है?

कभी सोचता हूँ कि
लोग करते है फ़रिश्तो से मिलने की फ़रियाद
तेरे तसवुर में हमें रहता नहीं कुछ भी याद
वो हाल जिसे छिपाने की कश्मकश में हूँ
मेरी निगाहों में सरेआम सा क्यों है ?

कभी सोचता हूँ कि....

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रेणु
30 सितम्बर 2017

प्रिय शिव -- हमेशा की तरह भावनाओं का एक और रंग लिए आपकी रचना बहुत भावपूर्ण है सस्नेह शुभकामना आपको |

शिवदत्त
01 अक्तूबर 2017

बहुत आभार

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