“दोहा मुक्तक”

29 सितम्बर 2017   |  महातम मिश्रा   (55 बार पढ़ा जा चुका है)

“दोहा मुक्तक”


भूषण आभूषण खिले, खिल रहे अलंकार।

गहना इज्जत आबरू, विभूषित संस्कार।

यदा कदा दिखती प्रभा, मर्यादा सम्मान-

हरी घास उगती धरा, पुष्पित हरशृंगार॥-१


गहना हैं जी बेटियाँ, आभूषण परिवार।

कुलभूषण के हाथ में, राखी का त्यौहार।

बँधी हुई ये डोर है, कच्चे धागे प्रीत-

नवदुर्गा की आरती, पुण्य प्रताप अपार ॥-२


महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी

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