कोई और कहे न कहे - मैं तो कहूँगी - ''कृतज्ञ दुनिया इस दिन की .''

01 अक्तूबर 2017   |  शालिनी कौशिक एडवोकेट   (115 बार पढ़ा जा चुका है)

कोई और कहे न कहे - मैं तो कहूँगी - ''कृतज्ञ दुनिया इस दिन की .''

एक की लाठी सत्य अहिंसा एक मूर्ति सादगी की,

दोनों ने ही अलख जगाई देश की खातिर मरने की .

..........................................................................

जेल में जाते बापू बढ़कर सहते मार अहिंसा में ,

आखिर में आवाज़ बुलंद की कुछ करने या मरने की .

.............................................................................

लाल बहादुर सेनानी थे गाँधी जी से थे प्रेरित ,

देश प्रेम में छोड़ के शिक्षा थामी डोर आज़ादी की .

...................................................................................

सत्य अहिंसा की लाठी ले फिरंगियों को भगा दिया ,

बापू ने अपनी लाठी से नीव जमाई भारत की .

...........................................................................

आज़ादी के लिए लड़े वे देश का नव निर्माण किया ,

सर्व सम्मति से ही संभाली कुर्सी प्रधानमंत्री की .

...................................................................

मिटे गुलामी देश की अपने बढ़ें सभी मिलकर आगे ,

स्व-प्रयत्नों से दी है बढ़कर साँस हमें आज़ादी की .

............................................................................................

दृढ निश्चय से इन दोनों ने देश का सफल नेतृत्व किया

ऐसी विभूतियाँ दी हैं हमको कृतज्ञ दुनिया इस दिन की .


शालिनी कौशिक [कौशल]

अगला लेख: इज़्ज़तघर मतलब नया बलात्कार घर



रवि कुमार
03 अक्तूबर 2017

बहुत ही खूब

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
03 अक्तूबर 2017
बहुत सह लिया ,सुन लिया ,सारी परिस्थितियां अपने क्षेत्र के पक्ष में होते हुए मात्र राजनीतिक स्थिति खिलाफ होते हुए कम से कम मेरा मन सब कुछ गंवाने को गंवारा न हुआ क्योंकि न केवल इसमें मात्र मेरे क्षेत्र के आर्थिक हितों की हानि है बल्कि इसमें जनता के न्यायिक हित भी छिन रहे है
03 अक्तूबर 2017
09 अक्तूबर 2017
वो चेहरा जो शक्ति था मेरी , वो आवाज़ जो थी भरती ऊर्जा मुझमें , वो ऊँगली जो बढ़ी थी थाम आगे मैं , वो कदम जो साथ रहते थे हरदम, वो आँखें जो दिखाती रोशनी मुझको ,वो चेहरा ख़ुशी में मेरी हँसता था , वो चेहरा दुखों में मेरे रोता था , वो आवाज़ बाते
09 अक्तूबर 2017
24 सितम्बर 2017
''शादी करके फंस गया यार , अच्छा खासा था कुंवारा .'' भले ही इस गाने को सुनकर हंसी आये किन्तु ये पंक्तियाँ आदमी की उस व्यथा का चित्रण करने को पर्याप्त हैं जो उसे शादी के बाद मिलती है .आज तक सभी शादी के बाद नारी के ही दुखों का रोना रोते आये हैं किन्तु क्या कभी गौर किया उस विपदा का जो आदमी के गले
24 सितम्बर 2017
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x