अब छोड़ दिया...!

11 अक्तूबर 2017   |  संतोष झा   (241 बार पढ़ा जा चुका है)

अब छोड़ दिया...!

बहुत साल पहले, एक फिल्म त्रिशूल देख कर आए मेरे चचा बेहद बेहद खफा थे। बस शुरू हो गये – हद है, तहजीब गयी तेल बेचने, अब तो सिनेमा देखना ही छोड़ दूंगा।

हिम्मत जुटा कर मैंने उनसे पूछा, किस बात से नाराज हैं?

कहने लगे, सिनेमा में कभी भी गलत बात नही दिखानी चाहिए, सिनेमा हमारे समाज की तहजीब का हिस्सा है। समझाया, देखो बेटा, ये जो अमिताभ की मां, वहीदा ने गाने में कहा, मेरी बर्बादी के दामिन अगर आबाद रहे, मैं तुझे दूध ना बख्सूंगी तुझे याद रहे, ये बेहद गलत है। कोई मां अपने बच्चे को वाय्लेन्स सिखाती है? कोई अपने बेटे से कहता है कि तू दुश्मनी की आग मैं जलता रह। कैसे मां होकर कोई कह सकती है अपने बेटे को कि वो रिवेंज के इमोशन्स को दुनिया के हर इमोशन और वैल्यू से ऊपर रक्खे। और दूध का वास्ता इसके लिए! हे भगवान, कैसे ऐसी फिल्में बनाते हैं! और एक बार कह गये तो कोई बात नहीं, पूरी फिल्म में बार बार इसको दुहराना, ओह!

मैं चुपचाप सरक लिया। छोटा था, कुछ समझ में नही आया।

ईश्वर की साजिश देखिए, अपने और परायों ने छोटी उमर से ही इतने दुख दिए मगर मां ने कभी वो नही कहा जो वहीदा जी ने बच्चन साहिब से कहा। हां, कबीर के दोहे याद कराए, बुरा जो देखन मैं चला मुझसा बुरा ना कोई!

... यही तहजीब है हमारी, ऐसी हैं माएं हमारी...।

वैसे, अब चचा जान फिल्में देख नही पाते, मैने कब का देखना छोड़ दिया है...!

अगला लेख: अहम् ब्रह्मास्मि...



Dr poonamsharma
14 अक्तूबर 2017

बहुत सुंदर.... सच में कोई भी माँ अपने बच्चो को जीवन भर प्रतिशोध की आग में जलना नहीं सिखाता ,अन्याय का विरोध करना अलग बात है |पर कभी कभी प्रतिशोध भावना की छाया संतान पर पड़ ही जाती है.... महाभारत में द्रुपद ने तो संतान प्राप्ति ही प्रतिशोध के लिए की थी |

Dr poonamsharma
14 अक्तूबर 2017

बहुत सुंदर.... सच में कोई भी माँ अपने बच्चो को जीवन भर प्रतिशोध की आग में जलना नहीं सिखाता ,अन्याय का विरोध करना अलग बात है |पर कभी कभी प्रतिशोध भावना की छाया संतान पर पड़ ही जाती है.... महाभारत में द्रुपद ने तो संतान प्राप्ति ही प्रतिशोध के लिए की थी |

रेणु
11 अक्तूबर 2017

थोड़े शब्दों में जज्वाब सन्देश !!!!! सचमुच असली माएं ऐसी ही होती हैं ------ रजत पट की माँ तो पैसे कमाने के लिए बोलती है | अच्छा हुआ आपने फिल्मे देखना छोड़ दिया ---- मुझे याद नहीं पिछली बार कब देखि थी!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

संतोष झा
12 अक्तूबर 2017

छोटी बहन, कुछ साल पहले, जबरदस्ती मुझे मल्टीप्लेक्स में एक फिल्म देखने ले गए, कभी 4 रुपये में देखते थे, वो 500 रुपये में देखनी पड़ी और इतना लाउड साउंड था की कुछ समझ नहीं आया... इसी को कहते हैं, माया मिली न राम...! बुढ़ापे में शौक़ीन होने का यही नतीजा होता है!

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