बातें कुछ अनकही सी...........: मैं चुप था क्योंकि मैं लाचार था

11 अक्तूबर 2017   |  युगेश कुमार   (76 बार पढ़ा जा चुका है)

बातें कुछ अनकही सी...........: मैं चुप था क्योंकि मैं लाचार था

मैं चुप था क्योंकि मैं लाचार था

वो भौंक रहा था क्योंकि हाँथों में तलवार था

आज समय बदल गया हमारा तो क्या कहें

वो जो हमें अय्यार कह रहा है ना,कभी हमारा ही यार था।

ज़िन्दगी को यूँ फुसला-फुसला कर चलाया था

उन्हें तरस भी न आई जो धूं-धूं कर बस्ती को जलाया था

पता है बड़े सुकून से रहते थे लोग यहाँ भी

फर्क तब पड़ा जब एक साधु एक मौलवी रहने आया था।

ये जो दो रुपए में आपका भविष्य बताते हैं मेलों में
उनसे पूछना क्या इसी दो रुपए से अपना भविष्य बनाया था
दुनिया में लोग तो आपको ठगने को आमद हैं दोस्तों
कभी किसी को हमने बनाया था,कभी किसी ने हमको बनाया था।

गुरेज उन्हें भी हमसे कम नहीं था
अपने दिल को हमने क्या कम जलाया था
हम तो बस इसी धोके में फँस गए ऐ दोस्त
सुना था कुछ बन गए कुछ को मोहब्बत ने बनाया था।

ये जो चार दीवारों से घिरा हुआ है घर है मेरा
इसे हमने यादों से रंगा और सपनों से सजाया था
ये जिसमें मैं रहता हूँ मकान है घर कहाँ है मेरा
घर वो है जहाँ माँ-बाप ने मुझे गिरते गिरते सँभलना सिखाया था।
©युगेश

बातें कुछ अनकही सी...........: मैं चुप था क्योंकि मैं लाचार था

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