कोई मजहब नहीं होता

12 अक्तूबर 2017   |  शिवदत्त   (83 बार पढ़ा जा चुका है)

कवि: शिवदत्त श्रोत्रिय


तुम्हारे वास्ते मैंने भी बनाया था एक मंदिर
जो तुम आती तो कोई गज़ब नहीं होता ||

मन्दिर मस्ज़िद गुरद्वारे हर जगह झलकते है
बेचारे आंशुओं का कोई मजहब नहीं होता ||

तुम्हारे शहर का मिज़ाज़ कितना अज़ीज़ था
हम दोनों बहकते कुछ अजब नहीं होता ||

जिनके ज़िक्र में कभी गुजर जाते थे मौसम
उनका चर्चा भी अब हर शब नहीं होता ||

जब से समझा क्या है, अमीरी की क़ीमत
ख़ुशनसीब है वो पागल जो अब नहीं रोता ||

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रेणु
12 अक्तूबर 2017

प्रिय शिव भावपूर्ण ------ शेरों से सजी बड़ी ही प्यारी सी रचना है आपकी | सस्नेह शुभकामना

शिवदत्त
13 अक्तूबर 2017

बहुत बहुत आभार रेणु जी आपका .....

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