"विधा- दोहा"

25 अक्तूबर 2017   |  महातम मिश्रा   (34 बार पढ़ा जा चुका है)

"विधा- दोहा"


रे रंगोली मोहिनी, कैसे करूँ बखान

विन वाणी की है विधा, मानों तुझमे जान।।-१


भाई दूजी पर्व है, झाँक रहा है चाँद

नभ तारे खुशहाल हैं, अपने अपने माँद।।-२


झूम रही है बालियाँ, झलक उठे खलिहान

पुअरा तपते खेत में, कहाँ गए धन धान।।-३


नौ मन गेंहूँ भरि चले, बीया बुद्धि बिहान

पानी छलके खेत में, सैंया मोर किसान।।-४


मौसम बदले शाम को, सर्दी खाँसी छींक

पूनम खिलती चाँदनी, लगती मन को नीक।।-५


मेरे भाई आप है, नेता अति गंभीर

कैसे जल्दी हो गए, धनी कुबेर अमीर।।-६


कुछ तो आप बताइए, कैसे फूले फूल

कुछ दिन पहले आप के, थी माथे पर धूल।।-७


भैया जी सेवा करो, अब तो भर ली जेब

इतना कैसे बढ़ गए, कही न कोई ऐब।।-८


अब तो चिंता हो रही, काले धन की छाप

कुरता भी अति साफ है, नेता साहब आप।।-९


देश विदेशा घूम के, ले ली सगरी सीख

भाई जी मत माँगिए, अब जनता से भीख।।-१०


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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