अपनी वास्तविक इच्छाओं को जांचे और परखे

31 अक्तूबर 2017   |  पंकज-प्रखर -   (173 बार पढ़ा जा चुका है)


इच्छा, आकांक्षा मनुष्य की प्रेरणा स्त्रोत है इच्छाएं है तो मनुष्य कर्म की और अग्रसर होता है | इच्छाएं नया जोश नई प्रेरणा का संचार मनुष्य के अंदर करने के साथ-साथ समाज में उसका स्थान भी निश्चित करती है लेकिन जब ये इच्छाएं आकाँक्षायें विकृत हो जाती हैं तो सम्पूर्ण जीवन को अशाँति तथा असन्तोष की आग में जलने के लिए फेंक देती हैं। वर्तमान समय में आज ये ही स्थिति हम समाज में देखते है| आज हम सभी लोगों का जीवन संतोष तथा शाँति से वंचित हो गया है। जीवन संघर्ष इतना बढ़ गया है कि इस पर बैठ कर दो मिनट सोच-विचार करने का समय भी नहीं मिलता। दिन-रात भागते, दौड़ते, सुख-सन्तोष की सम्भावनायें लाने के लिए कोई प्रयत्न अछूता नहीं छोड़ते फिर भी विकल तथा क्षुब्ध ही रहना पड़ रहा है। जीवनभर शांति और सुख के दर्शन ही नहीं होते। जहाँ और जिधर सुख-शाँति के लिए जाते हैं, उधर प्रतिकूल परिणाम ही हाथ आते हैं। आजीवन स्वयं को खपाते रहने, श्रम करते रहने, जीवन-रस सुखाते रहने और दौड़-धूप करते रहने पर भी रिक्तता, खिन्नता तथा सन्ताप की प्राप्ति मनुष्य के लिए निःसन्देह बड़े खेद तथा चिन्ता का विषय है। इसके आधार-भूत कारण की खोज निकालना, नितांत आवश्यक हो गया है। इस असफलता पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने से तो इसी परिणाम पर आना होता है कि हमें लक्ष्य-पथ भटका देने में हमारी स्वयं की विकृत आकाँक्षाओं का गहरा हाथ है। जो आकाँक्षायें जीवन की प्रेरणा स्त्रोत हैं वही विकृत हो जाने पर प्रवंचक बन कर जीवन के सहज तथा अभीष्ट पथ से हमें इधर-उधर ले जाकर अशाँति तथा असन्तोष के कंटकाकीर्ण मार्गों पर घसीट रही हैं। निश्चय ही जीवन में अभीष्ट सुख-शाँति पाने के लिए विकृत आकाँक्षाओं को संस्कृत तथा परिष्कृत करना होगा अथवा उन्हें अकल्याणकारी साथियों की तरह छोड़ ही देना होगा। जो प्रेरणा पाप बन कर अपने लिए भयानक हो उठे उसका परित्याग कर देना ही उचित है। विकृत आकाँक्षायें बड़ी भयावनी होती हैं। उनके प्रभाव से शीघ्र ही मनुष्य सत्पथ से भटककर विपथ पर खींचा चला जाता है। उसकी तृष्णा इतनी बढ़ जाती है कि मनुष्य उस बाज पक्षी की तरह मूढ़मति हो जाता है, जो जमीन पर पड़े काँच के टुकड़े में अपना प्रतिबिम्ब देख कर झपटता और उससे टकरा कर आहत हो जाता है। जीवन की वास्तविकता बहुत ही कठोर और कर्कश होती है। इस पर चल कर लक्ष्य तक पहुंचने के लिए बड़ी ही दृढ़ता तथा सतर्कता एवं धैर्य की आवश्यकता होती है किन्तु स्वार्थपूर्ण विकृत आकाँक्षाओं की माया मनुष्य को इतना कल्पनाशील तथा लोलुप बना देती है कि वह हर ध्येय को नितांत सरल तथा अपने योग्य मान लेता है। इसका फल यह है कि मनुष्य अपनी महत्वाकाँक्षाओं के साथ शीघ्र ही आकाश में उड़ जाता है और शीघ्र ही वेग कम होने से नीचे पृथ्वी पर गिर कर आहत होता और कराह उठता है। जिस सुख-शाँति के लिए उसने उड़ान भरी थी, वह तो मिली नहीं उल्टा अशाँति, पीड़ा तथा असन्तोष का भागी बनना पड़ा। विकृत आकाँक्षाओं का विष बड़ा तीव्र होता है। इसका अभ्यस्त मनुष्य एक अजीब नशे से रह कर जीवन के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर ही भागता दौड़ता है और अन्त में अशाँति तथा पश्चाताप के साथ विदा हो जाता है। वास्तविक आकाँक्षायें तो वही कही जायेंगी जिनके पीछे कुछ उद्देश्य, हित, आदर्श, आवश्यकता अथवा उपयोगिता की प्रेरणा मौजूद है। यूँ ही किसी लोभ-लालच अथवा स्वार्थ से प्रेरित होकर ऊट-पटाँग आकाँक्षाओं को पाल लेना कोई बुद्धिमानि नही है? यह तो उसकी कबाड़ी जैसा काम है जो अपने घर में जगह-जगह से उठा कर लायी गयी तमाम निरर्थक और निरुपयोगी वस्तुओं का ढेर लगा लिया करता है। आकाँक्षायें जीवन की प्रेरणा स्त्रोत अवश्य हैं किन्तु उनको समझने, परखने के लिए विवेक की आवश्यकता होती है। अपने हृदय में पालने से पहले अपनी आकाँक्षाओं की परीक्षा कर लेना और यह समझ लेना परम आवश्यक है कि इनमें कोई यथार्थ तथा उपयोगी तत्व भी है अथवा यह केवल वह माया-जाल है जो मनुष्य के सहज सुन्दर जीवन को भुलावे की राहों पर भटका देता है और मनुष्य अपनी सहज शाँति, मानसिक व्यवस्था और बौद्धिक संतुलन खो बैठता है। थोड़ी बहुत आकाँक्षायें सभी में होती हैं। इस संसार में सर्वथा इच्छाशून्य हो सकना सम्भव नहीं है। आकाँक्षायें जीवन का प्रतीक हैं, अग्रसर होने की प्रेरणा हैं। मनुष्य में इनका होना स्वाभाविक ही है। फिर भी अकल्याणकारी इच्छाओं को मनुष्य की स्वाभाविक आकाँक्षाओं में स्थान नहीं दिया जा सकता है। मानिये, यदि कोई चोरी, मक्कारी, लूट-पाट और दूसरों का शोषण करके धन प्राप्त करने की आकाँक्षा करता है, किसी भी अनीति और अन्यायपूर्ण प्रयत्नों से धनाढ्य बनना चाहता है तो क्या उसकी यह आकाँक्षा उचित और स्वाभाविक मानी जायगी? नहीं कदापि नहीं। यह तो आकाँक्षा नहीं है। इसको तो उसकी आसुरी और आततायी वृत्ति ही कहा जायेगा। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति में स्थान पाने, अपना प्रभाव जमाने की आकाँक्षा रखता है और उसे मूर्तिमान करने के लिये निर्बल एवं असहाय व्यक्तियों को सताता उनको ताड़ना देता है, और इस प्रकार अपना आतंक फैलाता है तो क्या उसकी यह आकाँक्षा उचित कही जायेगी? यह तो एक मात्र उसका पागलपन ही माना जायेगा। समाज में स्थान पाने, लोगों को प्रभावित करने के लिये तो सेवा, परोपकार और सहयोग, सहायता एवं सद्-व्यवहार तथा सदाचरण का ही मार्ग निर्धारित किया गया है। इससे विपरीत मार्ग पर चल कर उद्देश्य की पूर्ति के लिये प्रयत्नशील होने वाला व्यक्ति तो समाज का शत्रु ही माना जायेगा। मनुष्य की वे आकाँक्षायें ही वास्तविक आकांक्षायें हैं, जिनके पीछे स्वयं उसका तथा समाज का हित सन्निहित हो। जो आकाँक्षायें समाज अथवा अपनी आत्मा की साधक न होकर बाधक होती हैं, वे वास्तव में दुष्प्रवृत्तियाँ ही हुआ करती हैं, जो लोभ और मोहवश आकाँक्षा जैसी जान पड़ती हैं। विनाशात्मक आकाँक्षायें रखने वाले व्यक्ति रावण, कंस, दुर्योधन जैसे दुष्ट महत्वाकाँक्षियों के ही संक्षिप्त संस्करण होते हैं जो जीवन में एक बूँद भी सुख-शाँति और सन्तोष नहीं पा सकते और मरणोपरान्त युग-युग तक धिक्कारे जाते रहते हैं। आज हमारी अशाँति, असन्तोष और सन्ताप से भरी हुई जिन्दगी का मुख्य कारण हमारी विकृत आकाँक्षायें ही हैं, जो लोभ की मरु-मरीचिका और मोह की मृग-तृष्णा में भटकती हुई उस पथ पर नहीं आने देतीं, जिस पर स्वर्गीय शाँति और सन्तोष के दर्शन हो सकते हैं। अपनी आकाँक्षाओं की परीक्षा कीजिये, उन्हें सत्य एवं यथार्थ की कसौटी पर परखिये, हित-अहित की तुला पर उनका जाँचिये और जो भी बाधक आकाँक्षायें हो उन्हें तुरन्त अपनी मनोभूमि से निकाल बाहर करिये। उचित, उपयोगी और रम्य, रंजक आकाँक्षाओं को पालिये उनकी पूर्ति के लिये अबाध प्रयत्न एवं अखण्ड पुरुषार्थ करिये, सुन्दर, शिष्ट और सुशील मार्ग का अवलम्बन कीजिये और तब देखिये कि आपके जीवन में स्थायी और अक्षय सुख-शाँति का समावेश होता है या नहीं?



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