कुछ फायदा नहीं

03 नवम्बर 2017   |  शिवदत्त   (181 बार पढ़ा जा चुका है)

कुछ फायदा नहीं

मैं सोचता हूँ, खुद को समझाऊँ बैठ कर एकदिन
मगर, कुछ फायदा नहीं ||

तुम क्या हो, हकीकत हो या ख़्वाब हो
किसी दिन फुर्सत से सोचेंगे, अभी कुछ फायदा नहीं ||

कभी छिपते है कभी निकल आते है, कितने मासूम है ये मेरे आँशु
मैंने कभी पूछा नहीं किसके लिए गिर रहे हो तुम
क्योकि कुछ फायदा नहीं

तुम पूछती मुझसे तो मैं बहुत कुछ कहता
मगर वो सब तुम्हे सुनना ही कहाँ था जो मुझे कहना था
मगर रहने दे, कुछ फायदा नहीं

फिर से वही दर्द वही आहे, लाख रोके खुद को फिर भी वही जाए
बेहतर होता कि कभी मिलते ही नहीं
मगर अब जब मिले है तो ये दर्द सहने दे
कुछ फायदा नहीं

वो कहती है में उसके काबिल नहीं हूँ
बहुत है अभी जिन्हे मै हासिल नहीं हूँ
कुछ भी हो हक़ीक़त मगर पागल नहीं हूँ
मगर कुछ फायदा नहीं

किसी दिन फुर्सत से सोचेंगे , अभी कुछ फायदा नहीं ||

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रेणु
19 नवम्बर 2017

वो कहती है में उसके काबिल नहीं हूँ
बहुत है अभी जिन्हे मै हासिल नहीं हूँ---------- बहुत खूब लिखा आपने प्रिय शिव !!!!!!!!!! एक विकल मन का वीतराग| है आपकी रचना !

शिवदत्त
19 नवम्बर 2017

बहुत बहुत आभार रेणु जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए

अलोक सिन्हा
04 नवम्बर 2017

बहुत सुंदर रचना है ,

बहुत अच्छी रचना है ,

शिवदत्त
04 नवम्बर 2017

बहुत बहुत आभार आपका. ...

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