“भोजपुरी लोकगीत” कइसे जईबू गोरी छलकत गगरिया, डगरिया में शोर हो गइल

07 नवम्बर 2017   |  महातम मिश्रा   (135 बार पढ़ा जा चुका है)

“भोजपुरी लोकगीत”


कइसे जईबू गोरी छलकत गगरिया, डगरिया में शोर हो गइल

कहीं बैठल होइहें छुपि के साँवरिया, नजरिया में चोर हो गइल......


बरसी गजरा तुहार, भीगी अँचरा लिलार

मति कर मन शृंगार, रार कजरा के धार

पायल खनकी ते, होइहें गुलजार गोरिया

मनन कर घर बार, जनि कर तूँ विहार


कइसे विसरी धना पलखत पहरिया. शहरिया अंजोर हो गइल

कइसे जईबू गोरी छलकत गगरिया, डगरिया में शोर हो गइल......


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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