"बुदबुद छंद"

14 नवम्बर 2017   |  महातम मिश्रा   (67 बार पढ़ा जा चुका है)

"बुदबुद छंद"


शिव शिव बोल बोल जै

बम बम बोल बोल जै।

शुभ दिन सोमवार है

कल कल गंग धार है।।


प्रति पल तोल मोल रे

ढब ढब ताल ढोल रे।

मन मन चाह चोर है

निज गृह छाँह भोर है।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

अगला लेख: "पंक्तिका छंद"



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
06 नवम्बर 2017
“गीतिका”खुलकर नाचो गाओ सइयाँ, मिली खुशाली है अपने मन की तान लगाओ, खिली दिवाली है दीपक दीपक प्यार जताना, लौ बुझे न बातीचाहत का परिवार पुराना, खुली पवाली है॥कहीं कहीं बरसात हो रही, सकरे आँगन मेंहँसकर मिलना जुलना जीवन, कहाँ दलाली है॥होना नहीं निराश आस से, सुंदर अपना घर नीम छ
06 नवम्बर 2017
27 नवम्बर 2017
"घनश्याम छंद"मिला कर हाथ सर्व सखा जयकार करें।रहें जब साथ मानव सा हुक्कार करें।।यही मम देश भारत है मिल हाथ रहेंदिखे जब प्रात पर्व सखा पुर साथ रहें।।महातम मिश्र 'गौतम' गोरखपुरी
27 नवम्बर 2017
06 नवम्बर 2017
“मुक्तक” होता कब यूँ ही कभी, शैशव शख्स उत्थान जगत अभ्युदय जब हुआ, मचला था तूफानरिद्धी सिद्धि अरु वृद्धि तो, चलती अपने माप राह प्रगति गति बावरी, विचलित करती मान॥ तकते हैं जब हम कभी, कैसे हुआ विकास खो जाते हैं विरह में, उन्नति पर्व सुहास धीरज गृह आभा सुखी. सुखी नियति सह साख
06 नवम्बर 2017
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x