“गीतिका/ गज़ल”

14 नवम्बर 2017   |  महातम मिश्रा   (69 बार पढ़ा जा चुका है)

“गीतिका/ गज़ल”


बैठिए सर बैठिए अब गुनगुनाना सीख ले

हो सके तो एक सुर में स्वर मिलाना सीख ले

कह रही बिखरी पराली हो सके तो मत जला

मैं भली खलिहान में छप्पर बनाना सीख ले..


मानती हूँ बैल भी अब हो गए मुझसे बुरे

चर रहें हैं खेत बछड़े हल चलाना सीख ले॥


खाद देशी खो गई फसलों में फैली यूरिया

गुड़ का गोबर हो रहा है कुछ कमाना सीख ले॥


देख लिजे आँख से रुकती हुई हर साँस है

हाथ मल चलती सड़क जीवन बचाना सीख ले॥


लड़ रही है बहक गाडियाँ बिन युद्ध की रफ्तार है

दिन ढ़का दिखता नहीं है ढंग पुराना सीख ले॥


मत उड़ो आकाश में जी अब निभाते वे नहीं

जी के जोखिम पालतू से घर खिलाना सीख ले॥


आप भी “गौतम” सरीखे लग रहें इंसान हैं

जल गया वह दिल नहीं था फिर लगाना सीख ले॥


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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महातम मिश्रा
17 नवम्बर 2017

जी आदरणीय बिलकुल सही कहा आप ने , हार्दिक धन्यवाद

सार्थक रचना । मानव मेहनत करने से कतरा रहा है जिसका फायदा अवसरवादी उठा रहे हैं।

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