बदल रहा ये साल

16 नवम्बर 2017   |  पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा   (308 बार पढ़ा जा चुका है)

बदल रहा ये साल

युग का जुआ कांधे देकर, बदल रहा ये साल...

यादों के कितने ही लम्हे देकर,

अनुभव के कितने ही किस्से कहकर,

पल कितने ही अवसर के देकर,

थोड़ी सी मेरी तरुणाई लेकर,

कांधे जिम्मेदारी रखकर, बदल रहा ये साल...


प्रगति के पथ प्रशस्त देकर,

रोड़े-बाधाओं को कुछ समतल कर,

काम अधूरे से बहुतेरे रखकर,

निरंतर बढ़ने को कहकर,

युग का जुआ कांधे देकर, बदल रहा ये साल...


अपनों से अपनों को छीनकर,

साँसों की घड़ियों को कुछ गिनकर,

पीढी की नई श्रृंखला रचकर,

जन्म नए से युग को देकर,

सारथी युग का बनाकर, बदल रहा ये साल....


नव ऊर्जा बाहुओं में भरकर,

कीर्तिमान नए रचने को कहकर,

लक्ष्य महान राहों में रखकर,

आँखों में नए सपने देकर,

विकास पुरोधा बनकर, बदल रहा ये साल...


प्रस्तावों की इक सूची देकर,

मंत्र नए सबके कानों में कहकर,

अपनी मांग नई कुछ रखकर,

प्रण जन-जन से लेकर,


कुछ लेकर कुछ देकर, बदल रहा ये साल.....

अगला लेख: अनन्त प्रणयिनी



रेणु
18 नवम्बर 2017

आदरणीय पुरुषोत्तम जी ------
अपनों से अपनों को छीनकर,
साँसों की घड़ियों को कुछ गिनकर,
पीढी की नई श्रृंखला रचकर,
जन्म नए से युग को देकर,
सारथी युग का बनाकर, बदल रहा ये साल....
बहुत खूब लिखा आपने------------- हर साल की खट्टी मीठी यादें हमें जरुर याद रह जाती हैं |

बहुत बहुत धन्यवाद

सार्थक अभिव्यक्ति ।

शुक्रिया

सच कह रहे हैं आप ,सुन्दर अभिव्यक्ति

शुक्रिया

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