विश्वास बनाम अफवाह

18 नवम्बर 2017   |  विजय कुमार शर्मा   (247 बार पढ़ा जा चुका है)



महानायक अमिताभ बच्चन की एक पिक्चर आई थी देश प्रेमी। अमिताभ जी को एक ऐसी कॉलोनी में रहना पड़ता है जिसमें अलग-अलग धर्मों के लोग रहते हैं तथा छोटी-छोटी बातों का बतंगड़ बनाकर आपस में लड़ते रहते हैं। मगर यह उस देश प्रेमी का ही विश्वास होता है कि आपस में लड़ मरने वाले वही लोग देशप्रेमी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इकट्ठे खलनायकों को हराते हैं। दूरदर्शन का जमाना था तो विज्ञापन के माध्यम से जनता को अफवाहों से बचाने के लिए एक अभियान चलता था जिसका विषय था कि क ने पान खाया और उसने रंगीला थूका। बदलकर यह भी हो गया कि क ने पान खाया और उसे खून की उल्टी आई। अंत में अफवाह फैलते-फैलते यहां तक पहुंच जाती है कि पान खाने की वजह से क को खून की उल्टियां आईँ और उसकी मौत हो गई। जरा सोचें कि अगर वो आज का सोशल मीडिया युग होता और पान खिलाने वाला दूसरे धर्म का होता तो इस अफवाह के समाज पर क्या-क्या दुष्परिणाम होते अंदाज लगाना कठिन नहीं है। बात 2009 की है मैं पंचायत चुनावों में बतौर प्रीजाईडिंग अधिकारी अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा था। अनेक उम्मीदवार अनपढ़ थे जिनमें से सरपंच पद के लिए एक महिला प्रत्याशी भी थीं। पूरा दिन मतदान होता रहा। मतदान समापन उपरांत मतगणना पूर्ण होते ही स्टाफ सहित परिणाम घोषित करने के लिए हम मतगणना कक्ष से बाहर निकलने को ही थे तभी एकदम धड़ाम से दरवाजा खुला और भीड़ का रेला का रेला मतगणना कक्ष में घुस आया। जबतक हम कुछ समझ पाते पांच हजार के करीब भीड़ ने स्कूल में बनाए गए मतदान केंद्र सह मतगणना कक्ष को अंदर बाहर चहुँ ओर से घेर लिया। उस केंद्र पर हम कुल 25 मतदान अधिकारी थे। केवल एक पुलिस कर्मचारी को छोड़कर पंजाब पुलिस के सभी अधिकारी एवं कर्मचारी मतदान केंद्र को छोड़कर इधर-उधर हो गए। मगर जो एक कर्मचारी हमारे साथ बचा था वो हम सभी को मतदान सामग्री के साथ एक बड़े से कमरे में ले गया और किसी न किसी तरह दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। मौका मिलते ही हम ने पुलिस मुख्यालय को खबर कर दी। पुलिस के सायरन जब बजते हैं तो बड़े-बड़े हवा हवाई हो जाते हैं। पुलिस ने कुछ ही मिनटों में पूरी की पूरी भीड़ तितर बितर करदी। जब हमने परिणाम घोषित किया तो समझ में आया कि खोदा पहाड़ निकली चूहीया की तर्ज पर विजयी प्रत्याशी ही हेराफरी हो जाने की अफवाह पर बवाल खड़ा कर रहे थे। हिंदी की एमए करने के दौरान मुझे मौका मिला था तुलसी रचित राम चरित मानस के उपरांत अवधी में दूसरा स्थान रखने वाले मलिक मुहम्मद जायसी रचित महाकाव्य पदमावत को पढ़ने का। मगर तब कभी यह सोचा तक नहीं था कि एक समय संजय लीला बंसाली पदमावती पर पिक्चर बनाएंगे और लठ्ठम लठ्ठ हो जाएगी। फिल्म का प्रोमो जारी होते ही अफवाह फैली कि बंसाली ने महान वीरांगना पदमावती का अपमान करके राजपूती आन-बान-शान को ललकारा है। देखते ही देखते मीडिया के माध्यम से यह अफवाह आग की तरह फैल गई और सरकार में बैठे नेताओं के हाथ पैर भी फूलने शुरु हो गए। किसी भी नेता ने आग बुझाने का प्रयास नहीं किया बल्कि राजनैतिक लाभ हेतु इस अफवाह को ज्यादा हवा दी। जरा सोचिए जब हम अपनी संस्कृति को महान बताते हुए रामायण के पारिवारिक झगड़े के फलस्वरुप रची गई रामायण को सही मानते हैं तो वे हमारे उच्च आदर्श ही हैं। जरा सोचिए रावण मुस्लिम न होकर महापंडित था और न ही वह सीता का हरण करने के लिए अयोध्या आया था। कैकेयी ने पुत्र मोह में रामचंद्र जी को बनवास दिलाया तो रामायण नामक महाकाव्य की रचना हुई। फिर बारी आती है महाभारत की तो इसमें भी धृतराष्ट्र का पुत्र मोह और दुर्योधन का लालच है। एक पारिवारिक झगड़ा जो सभी को ले डूबा। सबसे विचित्र लगता है द्रौपदी के पाँच पांडव पति। राजाओं-महाराजाओं और यहां तक सामान्य पुरुषों के बारे में एक से अधिक पत्नियां होना तो सुना भी और पढ़ा भी मगर महाभारत के इस कथन के अतिरिक्त कम से कम मैने तो न सुना न पढ़ा कि किसी महिला की एक ही समय में पांच पतियों से शादी हुई हो । मगर संस्कारवश हमें सिखाया-पढ़ाया गया है और हम श्रद्धा से शीश निवाते हुए इस पर विश्वास करते हैं। वापस फिर लौटते हैं बंसाली जी की ओर। बंसाली जी ने वीडियो सहित अनेक तरीके अपनाकर विरोध करने वालों को समझाने की कोशिश की मगर वे नहीं माने। फिर बारी आई बंसाली के रामबाण ईलाज की । उसने पदमावती मीडिया के प्रबुध लोगों को दिखा दी। वास्तविकता सामने आने पर विरोध करने वालों को लगा कि न सूत न कपास जुलाहे लठ्ठम लठ्ठ की तर्ज पर वे अफवाहों पर यकीन करके बवाल कर रहे थे और प्रजातंत्र को अफवाहतंत्र में परिवर्तित करने के प्रयास में थे। अब वे रक्षात्मक हो गए हैं तथा उन्हें भी यह पिक्चर दिखाने की मांग करने लगे हैं। मानव जीवन में सुखी रहने के प्रमुख मंत्रों में एक मंत्र यह भी है कि अफवाह न तो फैलाएं तथा न ही बिना सोचे समझे किसी अफवाह पर विश्वास करें। हमारे पूर्वज हमें विश्व के सर्वोत्तम आदर्श देकर गए हैं जिनपर हमें अडिग रहना चाहिए ताकि अवसरवादिओं तक यह संदेशा पहुंचे कि भारतीय जनता को मूर्ख बनाना आसान नहीं है और जिस दिन यह प्रयोग सफल हो गया उस दिन मेरे भारतवर्ष को विश्वशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता।










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रेणु
21 नवम्बर 2017

एकदम सही कहा आपने विजय जी ---- अफवाहों ने देश, समाज को हमेशा दिगभ्रमित किया है | जान माल और मानवता की अनेक बार इसी चक्कर में अपूर्णीय क्षति हुयी है | मैं अपनी तरफ से -- बिना देखे कहने के लिए - पद्मावती के बारे में भी ऐसा ही समझती हूँ-- पर इस बात से सहमत हूँ कि इस अफवाह -- परम्परा से बचने में भलाई है | विरोध के और भी रस्ते हैं -- देश का कानून भी तो है | अच्छा लिखा आपने |

एकदम सही कहा है आपने

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