लो फिर बिक गया .........

21 नवम्बर 2017   |  शालिनी कौशिक एडवोकेट   (220 बार पढ़ा जा चुका है)

लो फिर बिक गया .........

कल से उत्तर-प्रदेश में नगरपालिका चुनावों में पहले चरण का मतदान आरम्भ होने जा रहा है .सभी मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करते हुए निष्पक्ष एवं स्वतंत्र मतदान करेंगे.इससे बड़ा झूठ इस भारतीय लोकतंत्र में नहीं हो सकता. निष्पक्ष एवं स्वतंत्र मतदान की हामी भरने वाला भारतीय लोकतंत्र किस हद तक निष्पक्ष एवं स्वतंत्र है इसे हमारे नेतागण से कहीं ज्यादा हमारे वोटर जानते हैं जो भारतीय लोकतंत्र में मतदान का कार्य तो करते हैं किन्तु पूरी तरह से लालच की भावना के वशीभूत होकर और यह कोई एक दो दिन की तैयारी से नहीं वरन वर्षो पुरानी सोची-समझी रणनीति के तहत किया जाता है .

एक व्यक्ति की वोट एक जगह ही होगी हमारी सरकार व् सुप्रीम कोर्ट इसके लिए प्रयत्नशील है और इसके लिए ही वह आधार कार्ड को लेकर ज़रूरी घोषणाओं में व्यस्त है क्योंकि आधार कार्ड अगर ज़रूरी हो गया तो पूरे भारत वर्ष में एक व्यक्ति की एक जगह की उपस्थिति पूरे देश में उसकी उपस्थिति मानी जाएगी क्योंकि आधार नंबर पूरे देश में एक ही होता है क्योंकि इस नंबर में व्यक्ति के अंगूठे की छाप ली जाती है और ये नहीं पलटती इसलिए आदमी का नंबर भी नहीं पलट सकता और इसीलिए आधार कार्ड को लेकर विरोध जारी है और यह विरोध ही हमारी जनता का व् हमारे नेतागणों के बुरे इरादे खोलने को काफी है .

लड़की की शादी अधिकांशतया दूसरी जगह पर होती है और भारतीय परंपरा के अनुसार वह विदा होकर दूसरे शहर ,गांव,कस्बे में चली जाती है, ऐसे में उसका वोट भी उसके मायके से काटकर ससुराल में चला जाता है किन्तु चुनावी मामलों में ऐसा नहीं होता ,यहाँ लड़कियां घरवालों को बोझ नहीं लगती यहाँ तक कि वे घर जंवाई भी वोट के लिए रखने को तैयार रहते हैं .चुनावी रंगत में लड़की विदा के बाद भी अपने मायके में रहती है [अरे केवल उसकी वोट ,सच्चाई में या शरीर से नहीं ]और तो और उसका पति भी वहां आ जाता है न किसी नौकरी के इरादे से और न कारोबार की इच्छा से मात्र वोट डालने के मकसद से .

यही नहीं कैराना क्षेत्र से २०१३ के दंगों के कारण पलायन की बड़ी-बड़ी गाथाएं लिखी गयी , राजनीति क मंचों पर गायी गयी किन्तु वोट के मामले में कोई पलायन नहीं सारी वोट जस की तस .अगर वोटर लिस्ट पर नज़र डाली जाये तो वास्तव में पलायन की सारी कहानी धरी की धरी रह जाएगी .

ऐसा नहीं है कि पलायन नहीं हुआ ,हुआ ,क्षेत्र की अविकसित स्थिति ,शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ापन व् अपराध की तरफ बढ़ते क्षेत्र के कदम को लेकर पलायन हुआ ,घर खाली हो गए किन्तु वोट बनी रह गई और यह निश्चित है कि पलायन करने वालों की वोट नई जगह भी बन चुकी होंगी और वे दोनों जगह पड़ेंगी भी और वह भी बिक्कर .

वोट बिकने का सिलसिला पुराना है ,वोटर जगह छोड़ देता है पर वोट नहीं कटती ,कारण छोड़ने वाली जगह पर उसके ऐसे ''कॉन्टेक्ट्स '' बन जाते हैं जिन्हें उनके पक्ष में वोट डालकर निभाना उसकी जिम्मेदारी बन जाती है और वह इस जिम्मेदारी को निभाता है ,चाहे इस लोकतंत्र ,इस देश के प्रति अपनी कोई जिम्मेदारी निभाए न निभाए .चुनाव में खड़ा प्रत्याशी उसके आने जाने के लिए या तो गाड़ी उपलब्ध कराता है ,या किराया देता है ,उसके खाने-पीने का इंतज़ाम करता है और वोटर आकर उसके पक्ष में वोट डालकर ''निष्पक्ष व् स्वतंत्र मतदान ''की जिम्मेदारी निभाकर लौट जाता है .

यही नहीं कि जो वोटर बाहर चले गए उनका ही इंतज़ाम किया जाता हो ,इंतज़ाम अपने स्थानीय वोटर का भी किया जाता है .उनके भी खाने-पीने का इंतज़ाम किया जाता है और ऐसे में सारे सरकारी नियमों को ठेंगा दिखा दिया जाता है .चुनाव आयोग ने इस बार चुनाव प्रचार थमने के साथ ही शाम पांच बजे से शराब के ठेके बंद करने के आदेश दिए थे .ऐसे में प्रत्याशियों द्वारा अपने पिय्यकड़ वोटरों के लिए ठेके बंद होने से पहले ही शराब का इंतज़ाम अपने वोटर से वोट खरीदने के लिए कर लिया गया है.

कैसे हो सकता है इस लोकतंत्र का कल्याण ,लोकतंत्र जिसके लिए अब्राहम लिंकन ने ''जनता की,जनता के लिए ,जनता के द्वारा सरकार शब्दावली का प्रयोग किया था उसके लिए भारतीय बुद्धिजीवियों ने बिलकुल सही परिभाषा दी कि यह मूर्खों की ,मूर्खों के लिए व् मूर्खों के द्वारा बनी सरकार है और क्या गलत कहा हमारे बुद्धिजीवियन ने जब इसमें योग्यता ,ईमानदारी की कोई कदर नहीं ,कदर है तो केवल पैसे की ,पहले टिकट खरीदो और टिकट भी अगर सत्तारूढ़ पार्टी का हो तो वारे-न्यारे ,प्रशासन का साथ तब मुफ्त में मिलता है ,फिर वोट खरीदो और ऐसे में जनता के लिए कुछ करने की न करने की काबिलियत हो या न हो जीत सुनिश्चित ,फिर काहे का लोकतंत्र और कैसा निष्पक्ष व् स्वतंत्र मतदान ,ऐसे में यही कहना पड़ेगा कि सब कुछ बिकता है ,लोकतंत्र बिकता है .


शालिनी कौशिक [कौशल ]

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आदरणीय शालिनी जी -- आपका लेख प्रशंसनीय है इससे कई जानकारिय मिली !
लेकिन चाहे वोटर हो या जनता हो या अन्य जो भी राजनीति के दायरे में आता हो वह भली प्रकार से जनता है की क्या होता है,कई बार तो ऐसा होता है जनता जानती है की जो व्यक्ति चुनाव में खड़े हैं उनमे से एक भी व्यक्ति सही नही है फिर भी वह व्यक्ति वोट देता है, हांलाकि वह नोटा का बटन दबा सकता है लेकिन भारत की जनता इतनी जागरूक नहीं है जितनी होनी चाहिए या यूँ कहे है भी तो वह इसमें कोई भाग नहीं लेना चाहती है,, अगर एक आदमी कुछ करने का बीड़ा उठा भबी लेता है वो भी ये समझकर की पब्लिक उसका साथ देगी बाद में सब पीछे हो जाते हैं कहते हैं की भैया मैं नहीं जनता कुछ भी आप जानो आपका काम जाने तो फिर बताइए की इस अंधी पब्लिक के लिए क्या किया जाए ,, यदि एक-दो लोग सही भी हैं वो जानते है वोट किसको देना
है और वो वोट सही जगह देते भी है लेकिन एक दो वोट सही जगह देने से क्या होता है ,,अगर ये बातें अपनी जनता समझ पाती तो बात कुछ अलग ही होती लेकिन व्यक्ति थोड़े से लालच व मक्कारी के कारण कुछ नहीं करते हैं

अगर कोई त्रुटि हो गई हो तो माफ़ करें

हिमांशु जी आपकी एक एक बात सही है मैं पूरे आलेख को पढने व उस पर सार्थक विचार रखने हेतु आपकी आभारी हूं

रेणु
21 नवम्बर 2017

आदरणीय शालिनी जी -- आपका आँखें खोल ने वाला लेख पढ़कर कई जानकारियां मिली | बहुत दुखद और निंदनीय है चुनावों में इस तरह की खरीदो - फरोख्त | सचमुच इस तरह के चुनावों को निष्पक्ष कैसे माना जाये | जनता शिक्षित होने के बावजूद कहाँ जागती है | लोग ज़रा से लालच के लिए अपना व दूसरों का भविष्य चौपट करने पर तुले हैं | काश !! वे ये बात समझ पाते |

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