कविता - आ लिपट गले

23 नवम्बर 2017   |  धर्मेंद्र राजमंगल   (143 बार पढ़ा जा चुका है)

कविता - आ लिपट गले

चप्पा चप्पा हर सडक सडक

करता मेरा दिल धडक धडक

तुझसे मिलने की चाहत में

न रहता दिल मेरा राहत में

है तू गई कहाँ मेरी बंजारन

आ लिपट गले जा मनहारन.

तेरी झीनी उस खुशबू में

खोता रहता क्यों मजनू मैं

लाली गुलाब सी होंठ खूब

नरमाई जैसे हो घास दूब

अब लौट के आजा मनभावन

आ गले लिपट जा मनहारन.

उन सख्त गर्म दोपहरी में

उन नर्म अँधेरी रातों में

फिर याद आये बरसातों

क्यों मन लागे तेरी बातों में

तेरे दर्शन का अभिलाषी मन

आ लिपट गले जा मनहारन.

चन्दन सा महके बदन तेरा

सापों सा मचले अधर मेरा

तेरे रूपों की चौखट तर

उछले मन तेरी आहट पर

तेरी चाहत का हो चुम्बन

आ लिपट गले जा मनहारन.

तेरी पलकों का गिरना उठना

चितवन से तेरी जीना मरना

मुस्कान तेरी कातिल होती

मन मर जाता जब तू रोती

सुन तू राधा मैं तेरा मनमोहन

आ लिपट गले जा मनहारन.

अधजल गगरी छलक छलक

ढूँढू तुझको मैं फलक फलक

चल अब तो मान जा ओ गोरी

काहे करती छल बरजोरी

मन किसना यादें वृन्दावन

आ लिपट गले जा मनहारन.

मोहे माफ़ी दे दे मतवाली

बन थोड़ी सी दिलवाली

चम्पई खिलती तू साड़ी में

मैं बाबा लगता इस दाढ़ी में

तू आज मिली तो हो शुभ छन

आ गले लिपट जा मनहारन.

सावन सिमटे तेरी बाँहों में

लू की गर्मीं तेरी सांसों में

पायल बाजे तेरी छनन छनन

कंगन ज्यों मेघा घनन घनन

मैं तेरा तू क्यों भई सौतन

आ गले लिपट जा मनहारन.

सुन रंग रंगीली रंगोली

बातें तेरी मीठी गोली

आ पास बैठकर बातें कर

बातों से भरता दिल पलभर

हो जा तू मेरी जीवन पूरन

आ गले लिपट जा मनहारन.

संकट में साथ तो दे मेरा

तू सबकुछ है मैं चेरा तेरा

आ चलते हम तुम संग संग

सिर चढ़ कर बोले रंग ढंग

तू बदली बन मैं तेरा सावन

आ गले लिपट जा मनहारन.

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रवि कुमार
30 जनवरी 2018

बहुत कमाल

जेपी हंस
26 नवम्बर 2017

मन भावन रचना

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