चलो अब चाँद से मिलने ....

24 नवम्बर 2017   |  रवीन्द्र सिंह यादव   (195 बार पढ़ा जा चुका है)

चलो अब चाँद से मिलने


छत पर चाँदनी शरमा रही है


ख़्वाबों के सुंदर नगर में


रात पूनम की बारात यादों की ला रही है।



चाँद की ज़ेबाई सुकूं-ए-दिल लाई


रंग-रूप बदलकर आ गयी बैरन तन्हाई


रूठने-मनाने पलकों की गली से


एक शोख़ नज़र धीर-धीरे आ रही है।



मुद्दतें हो गयीं


नयी तो नहीं अपनी शनासाई


शाम-ओ-सहर भरम साथ चलें अपने


कैसे समझूँ आ गयी वक़्त की रुसवाई


आ गया बर्फ़ीला-सा आह का झौंका


हिज्र में पलकों पे नमी आ रही है।



फूलों के भीतर


क़ैद हो गए हरजाई भँवरे


चाँद से मिलने गुनगुनाकर


जज़्बात फिर सजे-संवरे


उदासियों की महफ़िल में मशरिक़ से


मतवाली महक पुरवाई ला रही है।



चाँद आया तो भटके राही की


राहें रौशन हुईं


नींद उड़ने से न जाने कितनी


बेकल बिरहन हुईं


बिरहा के गीत सुनने


आते रहना ओ चाँद प्यारे


नये ज़ख़्म देने को


फिर सुबह आ रही है।


#रवीन्द्र सिंह यादव


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रेणु
29 नवम्बर 2017

आदरणीय रविन्द्र जी --- चाँद के बहाने से तन्हाई का सजीव और भावपूर्ण चित्र बहुत ही मर्मस्पर्शी है | चाँद ना जाने कितनी भावनाओं का साक्षी है | अब एक और का साक्षी हुआ | सादर -- सस्नेह --

हार्दिक आभार आपका आदरणीया रेणु जी . आपका उत्साहवर्धन और बेहतर लिखने को प्रेरित करता है.

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