गीत ----- मत कर यहाँ सिंगार ,

04 दिसम्बर 2017   |  आलोक सिन्हा   (76 बार पढ़ा जा चुका है)



मत कर यहाँ सिंगार ,

द्वार पर खड़ा हुआ पतझार ,

चार दिन की है सिर्फ बहार ||

दुनियां में हर फूल झूमता खिल कर मुरझाने को ,

दुनियां में हर सांस जागती , थक कर सो जाने को |

जीवन में बचपन का भोलापन यौवन की मस्ती ---

आते हैं दो चार कदम , हंस खेल बिछड़ जाने को |

हर बहार पतझर के दामन से उलझी होती है |

इसीलिये दो दिन रहता है , बगिया का सिंगार ||


दो पल को संध्या के हाथों में महदी रचती है ,

चार पहर रजनी की चूनर तारों से सजती है |

आँखों में आंसूं आने से पहले अधर विहंसते ,

और विरह से पूर्व मिलन की शहनाई बजती है |

सूरज की उजली किरणों से रात जनम लेती है |

और दिये की बांहों में पलता रहता अंधियार ||


सूरज का हर सुबह जन्म , हर शाम मरण होता है ,

अपना यौवन लुट जाने पर चाँद बहुत रोता है |

धानी चुनरी ओढ़ धरा दो पल को दुल्हन बनती ---

और रूप का अंत जरा के दरवाजे होता है ||

दुनियां की हर मांग सुहागिन बन कर ही लुटती है |

फूलों की सेजों पर सोये रहते हैं अंगार ||



रेणु
13 फरवरी 2018

आदरणीय आलोक जी -- मर्मस्पर्शी गीत है | प्रतीकात्मक ढंग से जीवन दर्शन खूब लिखा आपने | आजकल आपकी क्यों नई रचनाएँ नहीं आ रही | नए साल से कहीं पहले से ही आपका पेज खाली है लिखिए न कुछ | सादर नमन और आभार --- |

अलोक सिन्हा
18 फरवरी 2018

बहुत बहुत आभार , धन्यवाद | रेनू जी सटीक टिप्पणी के लिए |

अति सुन्दर रचना गुरु जी |

अलोक सिन्हा
18 फरवरी 2018

अन्वेष जी -- बहुत बहुत आभार , धन्यवाद |

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