खुद को तोड़ ताड़ के

10 दिसम्बर 2017   |  शिवदत्त   (107 बार पढ़ा जा चुका है)

कब तक चलेगा काम खुद को जोड़ जाड के

हर रात रख देता हूँ मैं, खुद को तोड़ ताड़ के ||


तन्हाइयों में भी वो मुझे तन्हा नहीं होने देता

जाऊं भी तो कहाँ मैं खुद को छोड़ छाड़ के ||


हर बार जादू उस ख़त का बढ़ता जाता है

जिसको रखा है हिफ़ाजत से मोड़ माड़ के ||


वैसे ये भी कुछ नुक़सान का सौदा तो नहीं

सँवार ले खुद को वो अगर मुझको बिगाड़ के ||


खुशबू न हो मगर किसी को ज़ख्म तो न दे

तुलसी लगा लूँ आँगन में गुलाब उखाड़ के ||

संचय (Hindi Poems): खुद को तोड़ ताड़ के

http://shivduttshrotriya.blogspot.in/2017/12/blog-post.html

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रेणु
12 दिसम्बर 2017

प्रिय शिव -- बहुत ही अच्छी रचना है आपकी | आखिरी शेर विशेष रूप से अच्छा लगा | सस्नेह बधाई और शुभकामना आपको |

शिवदत्त
13 दिसम्बर 2017

बहुत बहुत आभार रेणु जी, सब आप लोगो का आशीष है ||

नीरज चंदेल
11 दिसम्बर 2017

बहुत खूब !

शिवदत्त
11 दिसम्बर 2017

आभार नीरज जी. ...

अलोक सिन्हा
11 दिसम्बर 2017

शिव दत्त जी --- वास्तव में बहुत अच्छी गजल है | बहुत बहुत बधाई

शिवदत्त
11 दिसम्बर 2017

अलोक जी बहुत बहुत साधुवाद ..

जिसको रखा है हिफाज़त से।
वाह आसान शब्दों में सुंदर रचना।

शिवदत्त
11 दिसम्बर 2017

बहुत बहुत आभार आपका ...

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