"दोहा मुक्तक"

19 दिसम्बर 2017   |  महातम मिश्रा   (32 बार पढ़ा जा चुका है)

"दोहा मुक्तक"


पारिजात सुन्दर छटा, शम्भू के कैलाश।

पार्वती की साधना, पुष्पित अमर निवास।

महादेव के नगर में, अतिशय मोहक फूल-

रूप रंग महिमामयी, महके शिखर सुवास।।


हिमगिरि सुंदर छावनी, देवों का संसार।

कल्पतरु का वास जहाँ, फल फूले साकार।

जटा छटा शिर चाँदनी, पहिने शिव मृगछाल-

नयन रम्यता शिवपुरी, स्वर्गापति साकार।।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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