“दोहा-मुक्तक”

22 दिसम्बर 2017   |  महातम मिश्रा   (90 बार पढ़ा जा चुका है)

“दोहा-मुक्तक”


न्याय और अन्याय का किसको रहा विचार।

साधू बाबा भग गए शिक्षा गई बेकार।

नौ मन का कलंक लिए नाच रहा है चोर-

दशा फिरी है आठवीं पुलक उठी भिनसार॥-१


दौलत का इंसाफ हो हजम न होती बात।

सब माया का खेल है ठिठुर रही है रात।

हरिश्चंद्र ओझल हुए सत्य ले गए साथ-

बिन सबूत दिन दिन कहाँ किरण बिना कत प्रात॥-२


महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी

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महातम मिश्रा
28 दिसम्बर 2017

बहुत ही दूर की कौड़ी लातेहैं आप, क्या खूब कही, बहुत बहुत धन्यवाद, स्वागतम

रेणु
22 दिसम्बर 2017

हरिश्चंद्र ओझल हुए सत्य ले गए साथ--- वाह !! आदरणीय मिश्रा जी - बहुत ही दूर की कौड़ी लातेहैं आप -- बहुत सुंदर सार्थक पंक्तियाँ | आज के कटु सत्य को उजागर कर दिया आपने ---------- सादर-------

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28 दिसम्बर 2017
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