मूर्खों का पुलिन्दा (भारत का तथाकथित संविधान) और झण्डा प्रेम.....!

01 फरवरी 2018   |  अजीत सिंहः   (99 बार पढ़ा जा चुका है)

मूर्खों का पुलिन्दा (भारत का तथाकथित संविधान) और झण्ड़ा प्रेम....
"याद रखिए 1 भूल कई सारी उपलब्धियों पर पानी फेर देती है।" क्या यह सही नहीं है कि भारत का संविधान भारतजन विरोधी नहीं है? क्या जनता की जुबान पर लगे प्रतिबन्ध उचित हैं? उन्हें अपनी बात रखने के लिए विदेशी भाषा को सीखने पर मजबूर करना उचित है? जीवन के मूलभूत अंग 'शिक्षा' को प्राप्त करने के लिए विदेशी भाषा को सीखने के लिए मजबूर करना उचित है? कभी समझ न आने वाली अंग्रेजी व्यवस्था में निर्धन, लाचार, शोषित और पीडित लोगों को पल पल मरने के लिए विवश करना उचित है? सभी ज्ञान-विज्ञान को प्राप्त करने पर प्रतिबन्ध लगाना क्या उचित है? ज्ञान-विज्ञान के कमी के कारण लाखों करोडो लोगों को उपचार के बिना तडफ-तडफ कर मरने को मजबूर करना उचित है? यदि नहीं तो ऐसे संविधान और झण्डे के गीत गाने का क्या अर्थ है? जिस संविधान में लोगों को अपनी बात अपनी सामान्य भाषा में रखने का अधिकार नहीं.....! पढ़ने का अधिकार नहीं....! हम उस संविधान को जलते हुये देखने की कामना करते हैं। और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि जो भी उसके संरक्षक हों या बनें वो अकाल मृत्यु को प्राप्त हों। या कोई ऐसा वीर जन्म ले जो इनके मुंड काट कर चौराहे पर लगा सके।

#जयतुभारतम्

#अजीतसिंहः

अगला लेख: भारत में अंग्रेजी कलैण्डर क्यों भारतीय पंचांग क्यों नहीं.....



भारत का सम्विधान लचीला और परिवर्तनशील है ! अगर आपके द्वारा भेजे हुए सांसद आपके विचारों पे विधेयक नही प्रस्तावित करवाते हैं तो या तो वे नालायक हैं या फिर आपने गलत प्रतिनिधि का चयन किया है | और आपकी लेखन शैली से समझ आ रहा कि आप अपने देश और उसकी विरासतों की कद्र करते होंगे?

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