होली,

02 मार्च 2018   |  नृपेंद्र कुमार शर्मा   (70 बार पढ़ा जा चुका है)

होली भी हो ली अब चारों और सन्नाटा है,
त्योहारों में भी अब बस फर्ज निभाया जाता है।

नही रहा वह वक़्त त्योहारी उत्सब की खुशियां छाती थीं,
होली और दीवाली की तैयारी हफ्तों पहले से होती थी।

नही समय अब पास किसी को त्योहारों को मनाने का,
सबको चिंता फिक्र है बस तो सुबह काम पर जाने का।

बदल रही है जीवन मूल्य आज व्यस्तता मानव की,
हर दम भागम भाग मची है बस जीविका कमाने की।

रिस्ते नाते तक छूटे हैं उत्सब अब हम मनाएं कैसे,
भागम भाग मची जीवन मे थम कर पीछे रह जाएं कैसे।

क्या लौटेगा समय पुराणा हर्ष और उल्लाश का,
क्या समझेंगे कभी हम अंतर जीवित का और लाश का।

होली क्या होने से बढ़कर वापस कभी मनाएंगे,
क्या अब हम थोड़े से रुक कर उत्सवमय हो पाएंगे।

अगला लेख: सोच,,,,



रेणु
02 मार्च 2018

प्रिय नृपेंद्र -- होली के बहाने से जीवन के बीते उत्सवमय जमाने की खूब याद दिलाई आपने | सचमुच वो दिन अब कभी भी वापस नहीं आएँगे | फिर भी ये त्यौहार शांत जीवन में कुछ पल के लिए हलचल से रंग तो जरूर भरता है | होली मुबारक हो | खुश रहो मस्त रहो गमेशा |

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x