“मुक्तक” माँ जगत की अन्नदाता भूख को भर दीजिये।

09 मार्च 2018   |  महातम मिश्रा   (87 बार पढ़ा जा चुका है)

“मुक्तक”


माँ जगत की अन्नदाता भूख को भर दीजिये।

हों सभी के शिर सु-छाया संग यह वर दीजिये।

उन्नति के पथ डगर पिछड़े शय शहर का नाम हो-

टप टपकती छत जहाँ उस गाँव को दर दीजिये॥-१


माफ कर जननी सुखी सारे सिपाही आप के।

बेटियों की हो रहीं कैसी बिदाई माप के।

जी रहें अंधेर में बिजली चिढ़ाती है कड़क-

खो गयी है प्रगति पथपर भार कंधे बाप के॥-२


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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