बेरुखी

11 मार्च 2018   |  नृपेंद्र कुमार शर्मा   (91 बार पढ़ा जा चुका है)

चन्द अल्फ़ाज़ भी मयस्सर नही हमको अबतो उनकी जानिब से ,
जो कभी मेरे वास्ते ठोकर पे ज़माना रखते थे।

न जाने मोहब्बत को किसकी नज़रे स्याह लग गई जो अब हम,
उस रूखसार के एक रुख को तरसते हैं।

कभी बातों में मिश्री घोलकर कितनी बातें बोलते थे ,
अब लगता है शायद मेरे कान अब काम नही करते हैं।

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Neeraj Katheria
07 अप्रैल 2018

दिल को छू गयी!!

रेणु
05 अप्रैल 2018

बहुत खूब प्रिय नृपेन्द्र !!!!!!!

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