खुदखुशी के मोड़ पर

15 मार्च 2018   |  शिवदत्त   (77 बार पढ़ा जा चुका है)

जिंदगी बिछड़ी हो तुम तन्हा मुझको छोड़ कर

आज मैं बेबस खड़ा हूँ, खुदखुशी के मोड़ पर ||


जुगनुओं तुम चले आओ, चाहें जहाँ कही भी हो

शायद कोई रास्ता बने तुम्हारी रौशनी को जोड़ कर ||


जनता हूँ कुछ नहीं मेरे अंदर जो मुझे सुकून दे

फिर भी जोड़ रहा हूँ मैं खुद ही खुद को तोड़ कर ||


जिस्म को ढकने को हर रोज बदलता हूँ लिबास

रूह पर नंगी है कब से मेरे बदन को ओढ़ कर ||



# शिवदत्त श्रोत्रिय

संचय (Hindi Poems): खुदखुशी के मोड़ पर

अगला लेख: कोई जब प्यार मे धोखा खा जाए



रेणु
15 मार्च 2018

प्रिय शिव -- बहुत दिनों के बाद आपकी ताजा रचना की सभी पंक्तियाँ बहुत ही हृदयस्पर्शी हैं खास कर ये पंक्तियाँ तो मुझे बहुत मार्मिक लगी |
जनता हूँ कुछ नहीं मेरे अंदर जो मुझे सुकून दे
फिर भी जोड़ रहा हूँ मैं खुद ही खुद को तोड़ कर ||
जिस्म को ढकने को हर रोज बदलता हूँ लिबास
रूह पर नंगी है कब से मेरे बदन को ओढ़ कर ||-------------
आपको रचना के लिए शुभकामनाएं देती हूँ | सस्नेह -------




शिवदत्त
15 मार्च 2018

बहुत बहुत आभार , आपकी प्रतिक्रिया हमेशा ही अमूल्य है मेरे लिए. ....

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x