हमारी बेटी बुलबुल है मगर पिंजरे में रहती है।

20 मार्च 2018   |  तुषार पराशर   (487 बार पढ़ा जा चुका है)

हमारी बेटी बुलबुल है मगर पिंजरे में रहती है। - शब्द (shabd.in)

उसे हम पर तो देते हैं मगर उड़ने नहीं देते,

हमारी बेटी बुलबुल है, मगर पिंजरे में रहती है।

- प्रो. रहमान मुस्सवीर

यह कुछ अल्फ़ाज़ है जो इस तस्वीर की सारी कहानी को बयां करते है। वैसे तो इस तस्वीर को समझने के लिए शायद ही शब्दों की कोई जरूरत हैं। यह तस्वीर उजागर करती है हमारे समाज के दोहरे चरित्र को, जहां हमने आपने बेटियों को कहने को तो आजादी दी है, लेकिन उनकी आजादी पर तमाम पाबंदियाँ लगा रखी है।

यह तस्वीर सवाल भी करती है कि आख़िर ऐसा क्यों है? क्यों 21वीं सदी का आधुनिक समाज महिलाओं के लिए आधुनिक क्यों नही हुआ? क्यों आज भी हमने हमारी बेटियों को बेड़ियों में जकड़ रखा है? क्यों हम उन्हें खुलके सास नहीं लेने देते? क्यों वो आज भी क़ैद है?


यह तस्वीर ना जाने कितने सवाल हमसे पूछ रही, जिनका हमारे पास कोई जवाब नहीं है।


वक़्त है सोचने का, लोगों को अपनी सोच बदलने का।

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Monika
21 मार्च 2018

बहुत ही सुन्दरता से ये सवाल उठाया आपने पर ये बिडम्वना है कि इसका कोई हल नही निकाल पाया है हमारा समाज

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