मैं नादान था मोहब्त कर बैठा

21 मार्च 2018   |  Vikas Khandelwal   (135 बार पढ़ा जा चुका है)

मैं नादान था मोहब्त कर बैठा



वो समझदार था हमसे नफरत कर बैठा



हमने उनको हमेशा पलकों पे रखा



वो हमको नजरो से गिरा बैठा



हाथ उसका मेरे हाथ मे तो पहले भी नहीं था



ज्यूही फेरी उन्होंने नज़र ,



उनका हसीन ख्वाब आँखों मे टूट बैठा



मै अब कभी खुद को देखता हू



कभी उनका सितम देखता हू ,



आईना दिल का , उनके पत्थर से टूट बैठा



मेरा तो कोई मांझी भी नहीं , कोई साहिल भी नहीं



और कोई ख़ुदा भी नहीं



जो इक अपना था वो भी आज रूठ बैठा







अगला लेख: चाँदनी रात मे आना तुम



Arun Suyash
21 मार्च 2018

दिल की गहराई से निकली अद्भुत रचना

Vikas Khandelwal
23 मार्च 2018

thanks dear Arun thanks

जय कुमार
21 मार्च 2018

खूबसूरत

Vikas Khandelwal
23 मार्च 2018

thanks jai kumar thanks

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