जब सवाल को मिल जाए मोक्ष

27 मार्च 2018   |  हरीश भट्ट   (50 बार पढ़ा जा चुका है)

जब सवाल को मिल जाए मोक्ष - शब्द (shabd.in)

जब हंगामे में सवाल ों का वजूद तक ख़त्म हो जाता हो, तब जवाब कहां से मिलेगा. सवालों के चक्रव्यूह में घिरी जिंदगी , महाभारत के अभिमन्यु सरीखी हो गई है. न तो अभिमन्यु चक्रव्यूह तोड़ पाया और न ही जिंदगी को सवालों के जवाब मिलने वाले है. बात सीधी सी है सवाल होते ही जब हंगामा हो जाता है, तब जवाब से पहले सवाल ही दम तोड़ देता है. बात बहुत है. प्रयास भी होते है. सवाल शुरू होते ही शुरू हो जाता है हंगामा. फिर होता है मंथन कि आखिर सवाल क्या था. जिसका जवाब तलाशने की कवायद में जिंदगी के चेहरे पर झुर्रिया तक उग आई है. अंत में जिंदगी निरुत्तर हो जाती है, एक सवाल के जवाब के इंतज़ार में. कहा जाता है कि बातचीत से हर सवाल का जवाब मिल जाता है, लेकिन जब तक हंगामा ख़ामोशी का दुश्मन है, तब तक जवाब से पहले सवाल मरते रहेंगे. जब तक सवाल जिंदा है तब तक जिंदगी है और जब सवालों को ही मोक्ष मिल जाए. तब जिंदगी बेमकसद हो जाया करती है और तब जवाब का क्या करना है. सवाल लेकर आये थे और निरुत्तर चले जायेगे कि मैं कौन हूं, क्यों आया- क्यों गया और मेरा क्या है. बस यूं ही

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